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अबकी बार 400 पार की हुंकार भरने वाली भाजपा, विपक्षी खेमें पर सेंध लगाने के बजाय अपनी भूलों को सुधारे

विपक्षी  बडे नेताओं को भाजपा में जुटाने के मिशन में जुटी  है भाजपा को चाहिये विदेशी मापदण्डों को छूने के बजाय भारतीय मूल्यों के अनुसार कल्याणकारी शासन दे

देवसिंह रावत

पूरा देश यह देख कर हैरान है कि  होने वाले लोकसभा चुनाव 2024 में  अब की बार 400की हुंकार भरने वाली भाजपा, विपक्षी दलों पर कहर व सेंघ लगा कर बड़ी संख्या में विपक्षी दिग्गजों को भाजपा में क्यों जुटा रही है?
लोकसभा चुनाव 2024 की इस निर्णायक शंखनाद की बेला में जब सतारूढ भाजपा गठबंधन व कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन एक दूसरे को इन जंग में धूल चटाने की हुंकार भर रहे हैं। ऐसे माहोल में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उप्र, हरियाणा, आंध्र प्रदेश व उतराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, कमलनाथ, सिद्धु, सहित अनैक दिग्गज नेता क्यों भाजपा  में जा रहे हैं या जाने की कतार में खडे है। वहीं राजग के पूर्व संयोजक व आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडे व उप्र में पश्चिम क्षेत्र के नेता जयंत चौधरी भी भाजपा गठबंधन में सम्मलित होने की देहरी पर खडे है। जिस प्रकार चंद महिने पहले भाजपा में जाने से पहले मरना पसंद करने की हुंकार भरने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी को सत्ताच्युत कराके खुद को प्रधानमंत्री बनने की मंशा से विपक्षी गठबंधन इंडिया’ के बनाने के मुख्य ध्वजवाहक बने थे, ने लोकसभा चुनाव से पहले यकायक इंडिया गठबंधन को बीच मजधार में छोडकर मोदी की ताजपोशी में राजग गठबंधन के सिपाहे सलार बन गये।
इसे देख कर देश की आम जनता ही नहीं भाजपा के कार्यकर्त्ता सहित वरिष्ठ नेता भी हैरान हैं कि आखिर कांग्रेस सहित विपक्ष के दिग्गज नेताओं को भाजपा में क्यों लाया जा रहा  है?  जबकि भाजपा के पास मजबूत व समर्पित नेता है जिनके संघर्ष, त्याग व समर्पण से भाजपा आज देश  की सत्ता में आसीन है? ऐसे समय जब ऐसे नेताओं को सत्ता में भागेदारी निभाने व भाजपा के आदर्शो -सपनों को साकार करने के समय आया तो ऐसे समय में सत्ता की मलाई खाने के लिये वे लोग भाजपा में आ रहे हैं जिन विपक्षी नेताओं को भाजपा कल तक भ्रष्टाचारी व दागदार बता कर पानी पी पी कर कोस रही थी? ऐसे लोगों को भाजपाई कल तक सत्ता में आने पर जेल डालने की हुंकार जनता व देश के समक्ष कर रहे थे।  ऐसे नेताओं पर अंकुश लगाने व सुयोग्य नेताओ को  सतासीन करने से रामराज की स्थापना होगी। पर हो रहा उल्टा , आखिर ऐसे भ्रष्टाचारी व दागदार नेताओं को भाजपा में ला कर महत्वपूर्ण पदों पर आसीन क्यों किया जा रहा है?
इसका एक ही कारण समझ में विशेषज्ञों के समक्ष में आ रहा है कि हर हाल में तीसरी बार मोदी को सतासीन करने के लिये विपक्ष में सेंध लगा कर, विपक्षी चुनौती को ध्वस्थकर व जनता के समक्ष एकमात्र विकल्प बनने के लिये कमलनाथ व सिद्धू जैसे बडे नेताओं को भाजपा में जुटाने के मिशन में जुटी  है भाजपा।
भाजपा को इस बार 2023 में 2024 के पूर्वार्ध में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये विपक्ष ने इंडिया गठबंधन बना कर  बडी चुनौती दी थी, उससे भाजपा के रणनीतिकारों को 2024 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान बहुमत संख्या को भी अर्जित करने के भाजपा की आशाओं पर गहरा संकट मंडराते नजर आने लगा। क्योंकि विपक्ष के खिलाफ भाजपा के पास विपक्ष पर प्रहार करने के तीन बडे सबसे बडा हथियार है कि परिवारवाद, भ्रष्टाचार व तुष्टिकरण का। भाजपा का आरोप है कि इन तीनों के कारण विपक्षी देश व प्रदेश जहां भी सत्ता में रहते हैं वहां वे देश व प्रदेश के विकास को अपने परिवार व निहित स्वार्थ  रूपि भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के कारण जहां विकास को अवरूद्ध करते हैं वहीं अंध तुष्टीकरण  कर देश के अमन चैन व अखण्डता को खतरे में डाल देते है। भाजपा का यह आरोप  जनता के गले भी उतर रहा है। क्योंकि जनता ने देखा कि किस प्रकार से रामजन्मभूमि मामले, धारा 370 व तीन तलाक जैसे मामले में विपक्ष ने जो रूख अपनाया वह किसी भी नजरिये से देश व न्याय के अनुकुल नहीं था। वहीं जिस प्रकार से विपक्षी के अधिकांश नेता अपने शासनकाल में भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हुये है। ऐसा आरोप मात्र भाजपा ही इन पर नहीं लगा रही है अपितु विरोधी दल भी एक दूसरे पर स्वयं लगाते रहे। शायद विपक्षी दलों के इस कुशासन से तंग आ कर देश की जनता ने देश व अनैक राज्यों में विपक्ष को सत्ताच्युत कर भाजपा को सत्तासीन कर रही है। परन्तु जब भाजपा ने संयुक्त विपक्ष का मुख्य सूत्रधार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बन रहे थे तो भाजपा के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई देनी सहज थी क्योंकि नीतीश कुमार के नेतृत्व में अगर विपक्ष मोदी को 2024 के लोकसभा चुनाव लडते तो भाजपा के विपक्ष को धराशाही करने वाले दो बडे अस्त्र भ्रष्टाचार व परिवारवाद कुंद हो जाते। ऐसी स्थिति में भाजपा को अपना लक्ष्य यानि पूरे दमखम से तीसरी बार मोदी सरकार का हासिल करने पर नीतीश कुमार बडे अवरोधक लगे।
भाजपा रने अपना पूरा ध्यान नीतीश कुमार को विपक्ष का नेतृत्व न बनने देने के लिये अपनी रणनीति में सफल तब हुये जब ममता व केजरीवाल ने केजरी के विरोध कर जहां नीतीश व विपक्ष के मजबूत इंडिया गठबंधन के मंसूबों पर बज्रपात करने का आत्मघाती कार्य  किया वहीं उन्होने मोदी को 2024 में फिर से सत्तासीन होने के मंसूबों पर पंख लगा दिये। अपनी अपनी महत्वकांक्षाओं व निहित स्वार्थो में घिरे विपक्षी नेताओ का यह गठबंध्ांन जिसे भाजपा ‘भानूमति का कुनबा’ कह कर उनकी एकता पर प्रहार करती है, नीतीश के भाजपा की शरण में जाने से रेत की महल की तरह ढह गया। इससे न केवल बिहार का विकट संकट टल गया अपितु उप्र, दिल्ली, बंगाल, हरियाणा व पंजाब में लगने वाला ग्रहण भी नीतीश के पलटुराम होने से हट गया।
कमलनाथ न केवल क्षत्रप हैं अपितु वे कांग्रेस के अर्थ जुटाने वाले बडे दिग्गज के रूप में जाने जाते है। वहीं महाराष्ट्र में मिलिंद देवडा के जाने से कांग्रेस को बडा झटका लगा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बडे दिग्गज रहे। इनमें अर्जुन सिंह के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद बडे क्षत्रपों में दिगविजय व सिंह व कमलनाद ही कांग्रेस के मजबूत स्तम्भ के बाद अब कमलनाथ जिनके नेतृत्व में कुछ माह पहले सम्पन्न विधानसभा चुनाव की कमान थी। उनका भाजपा में  जाना मात्र राज्यसभा न भेजने या प्रदेश अध्यक्ष आदि से हटाने से नहीं है। क्योंकि कमल नाथ न केवल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे अपितु देश के वर्षों तक कबीना मंत्री भी रहे। इसके साथ कांग्रेस में कमलनाथ को गांधी परिवार का अहम सदस्य भी माना जाता है। उनको इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे के रूप में कांग्रेस में सम्मान दिया जाता रहा। अब लोकसभा चुनाव के निर्णायक मोड पर जब कांग्रेस को कमल नाथ जैसे दिग्गज नेताओं की जरूरत है ऐसे समय पर क्या कमल नाथ केवल अपने बेटे नकुलनाथ के राजनैतिक भविष्य को संवारने के खातिर भाजपा का दामन नहीं थामेंगे। लगता है कमलनाथ भी भाजपा के उसी सामदाम दण्ड भेद के प्रहार से पस्त हो कर बचाव का एकमात्र रास्ता अजित पंवार आदि नेताओं की तरह दिखाई दिया हो। जहां वे बच्चों के भविष्य के साथ खुद भी राजनीति के आकाश में अपना परचम लहरा सकते हैं। क्योंकि मोदी व शाह की जोड़ी का ऐसा प्रचण्ड लहर को देखते हुये 2024 में ही नहीं अपितु एक दो दशक तक देश की राजनीति में विपक्ष के सत्तासीन होने के आसार नजर  नहीं आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा में सम्मलित होने की आश लगाने वाले कमलनाथ आदि नेता अपनी शर्तो पर नहीं अपितु भाजपा की दया पर ही भाजपा पर सम्मलित होंगे। अगर नहीं भी ये नेता भाजपा में सम्मलित होगे तो इनके इन अटकलों से अपने दल में वह महत्व व सम्मान नहीं रहा जिसको वे इन अटकलों से पहले पाते थे। इसके साथ ये नेता अब अपनी प्रतिभा व दमखम का लाभ अपने दल को भी नहीं दे पायेंगे व भाजपा इनके प्रकोप से कम से कम इन चुनावों में बच जायेगी। जहां तक बात पंजाब की। भाजपा के पास इस समय कोई ऐसी आशा नहीं है व नहीं भाजपा के पास पंजाब में कोई जनाधार वाला नेता ही है। इसी आश से सिद्धू को लाने का प्रयास किया जा रहा है। परन्तु अकाली दल से गठबंधन से सिद्धू नाखुश होगे। जेटली जैसे नेताओं के कारण भाजपा को पंजाब में सिद्धू जैसे भविष्य की आशाओं का सितारा नेता खोना पडा। देखना है कि पंजाब में गत दिनों भाजपा कैसा कदम उठाती है। परन्तु यह साफ है कि अतिविश्वास में भाजपा ने चण्डीगढ नगर निगम के चुनाव में मेयर प्रकरण में पूरे देश में अपनी जो किरकिरी कराई उससे साफ हो गया कि भाजपा अपनी उतराखण्ड में हरीश रावत सरकार को गिराने  जैसे भयंकर आत्मघाती भूलों से कोई सबक न लेकर जहां देश विदेश में भारत की लोकशाही की हंसी कराने से नहीं चूकती है वहीं जनता की नजरों में कोई आदर्श पेश नहीं कर पाती ।
परन्तु पश्चिम बंगाल सरकार पर जहां शक्ति करनी है वहां पर केवल कार्यकर्त्ताओं को हैवानियत का शिकार बनने को छोड देती। जिस प्रकार से भाजपा सरकार को अपनी उतराखण्ड सरकार द्धारा जनभावनाओं के अनुरूप राजधानी गैरसैंण, भू-मूल कानून आदि बनाने व अंकिता भण्डारी के असली गुनाहगारों को सजा देने के साथ अवैध घुसपेठ कर देश की सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे को रोकने में पूरी तरह असफल रही।
अपनी कमियों को दूर करने में भाजपा ध्यान नहीं दे रही है। पर 2024 के लोकसभा चुनाव में हर हाल में तीसरी बार मोदी को सतासीन करने के लिये विपक्ष में सेंध लगा कर, विपक्षी चुनौती को ध्वस्थकर व जनता के समक्ष एकमात्र विकल्प बनने के लिये भाजपा यह दिग्विजयी चक्रव्यूह का दाव खेल रही है। इससे जहां भाजपा के सम्मुख विपक्षी चुनौती ध्वस्थ हो जायेगी, विपक्षी आर्थिक रूप व संगठन रूप से बेहद कमजोर हो गया। इससे जनता के पास 2024 में एकमात्र विकल्प भाजपा दिख रही है। जो दल भाजपा के लिये चुनौती बन रहे थे उसका हस्र भाजपा ने शिवसेना व राकांपा की तरह कर दिया। जिसे भले ही  नैतिक रूप  से उचित नहीं माना जा सकता। परन्तु आज की राजनीति में देश को अंध तुष्टीकरण, भ्रष्ट्राचार व परिवार से बचाने के लिये उचित ही लग रहा है। भाजपा को पथभ्रष्ट राजनीति,अपराधियों व भ्रष्ट्राचार पर बिना दलगत भेदभाव के कडा प्रहार करना चाहिये।ं इसके साथ देश के युवाओं व रोजगारबर्धक योजनाओं व कल्याणकारी व्यवस्था को बढावा देना चाहिये।देश में इन दोनों मोर्चों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। देश की अर्थव्यवस्था को केवल आंकडों का परचम लहराने से अधिक कल्याणकारी शासन स्थापित करना चाहिये। इसके साथ देश के माथे पर 76 साल से लगे अंग्रेजी भाषा व इंडिया के कलंक को मिटा कर शिक्षा, न्याय, रोजगार, शासन व व्यवस्था में भारत व भारतीय भाषाओं का संचालन करना चाहिये। तभी देश में रामराज्य रूपि कल्याणकारी भारतीय व्यवस्था विश्व के लिये अनुकरणीय होगी। इसके साथ  भारतीय हुक्मरानों को विदेशी मानको व ढरे पर देश को संचालित करने के बजाय भारतीय मूल्यों के अनुरूप देश को संचालित करना चाहिये। तभी शासन सार्थक होगा। अन्यथा काल के विराट फलक में कितने चक्रवर्ती सम्राट औझल हो गये इसका किसी को भान तक नहीं है।इस 2024 के  लोकसभा चुनाव में सीटें कितनी आये,?  370 या 400 इस पर भाजपा  खुद ही एकमत नहीं है । पर यह सही है मिशन की सफलता के लिये आदर्श भी बेहतर होना चाहिये। लोकसभा चुनाव 2024में विजयश्री तो भाजपा को ही दिलाने का मन देश की जनता विपक्षी दलों की दिशाहीनता, परिवारवाद, भ्रष्टाचार व अंध तुष्टिकरण से व्यथित होकर भाजपा की कई  भूलों के बाबजूद बना चुकी है।जरूरत है भाजपा को अपनी भूलों को सुधारने की।

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