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देश पर लगे गुलामी के कलंक को मिटाने की जिम्मेदारी को नजरांदाज नहीं कर सकते सरकार व न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने देश का नाम से इंडिया हटा कर भारत करने के मामले में दखल देने से किया इनकार, सरकार को ज्ञापन देने की दी नसीहत

 

अंग्रेजो के जाने के 73 साल बाद भी क्यों बलात थोपी गयी अंग्रेजी भाषा व इंडिया नाम की गुलामी ?

 
देश के माथे पर लगे अंग्रेजी भाषा व इंडिया नाम की गुलामी कलंक को मिटाने के लिए 21 अप्रैल 2013 से सतत सत्याग्रह कर रहा है भारतीय भाषा आंदोलन

 
जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक पदयात्रा कर एक साल तक रोज दिया गया प्रधानमंत्री को ज्ञापन

 
कोरोना काल में हर दिन  दिया जा रहा है प्रधानमंत्री को खुला ज्ञापन,

नई दिल्ली(प्याउ)। 3 जून 2020
3 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने देश का नाम केवल भारत करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए  याची को सरकार के पास जा कर ज्ञापन देने की नसीहत देने को देश को अंग्रेजी भाषा व इंडिया की गुलामी से 21 अप्रैल 2013 से सतत ऐतिहासिक संघर्ष कर प्रधानमंत्री से हर रोज गुहार लगाने वाले भारतीय भाषा आंदोलन के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। इस मांग के लिए देश की सरकार से पोने सात साल से लगातार गुहार व ज्ञापन देने वाले   भारतीय भाषा आंदोलन की कोई सुनवाई न सरकार कर रही है। मांग को सुनने के बजाय शांतिपूर्ण आंदोलन को पुलिसिया दमन से रौंदने की धृष्ठता अनैक बार कर चूकी है। ऐसी स्थिति में भारतीय भाषा आंदोलन को सर्वोच्च न्यायालय की सलाह व सरकार के कृत्य देश की आंखों में धूल झोंकने से कम नजर नहीं आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय व सरकार को इस बात के लिए शर्मसार होना चाहिए कि एक आजाद देश में उसके सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में  कामकाज व सुनवाई नहीं होेती है केवल आक्रांताओं की भाषा अंग्रेजी में ही होता है। 73 साल से पूरे विश्व में देश के हुक्मरान न देश का नाम ही रोशन कर पाये। पूरा विश्व भारत का अपना नाम ही नहीं जानता। केवल अंग्रेजों द्वारा थोपे गये इंडिया नाम को ही विश्व भारत को जानता है।यानी भारत का नाम मिटाने का काम 73 सालों से बेशर्मी से किया गया। इसके साथ देश की लोकशाही की हकीकत यह है कि देश की जनता को अपनी भारतीय भाषाओं में न न्याय मिल सकता है व नहीं मानक शिक्षा व रोजगार। इस देश में भी सम्मान सहित पूरी व्यवस्था अंग्रेजी की गुलामी बेशर्मी से ढो रही है।
इससे इसे देश की संस्कृति पूरी तरह तहस नहस हो गयी है। देश के गौरवशाली इतिहास व संस्कृति से भी नौनिहालों को वंचित करके उन्हें फिरंगी संस्कृति का विषपान करने के लिए मजबूर किया जाता है। इस देश में उसी मेकाले की रणनीति के तहत भारतीय नौनिहालों को भारतीय भाषाओं व भारतीय संस्कृति से वंचित रख कर उन्हें भारत से धृणा करने व भारतद्रोह करने वाला बना दिया है। इसी कारण आज देश के विश्वविद्यालयों में भारत व भारतीय संस्कृति के खिलाफ आवाजे उठ रही है।
भारतीय भाषा आंदोलन ने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार व न्यायपालिका देश के माथे पर लगे इस गुलामी के बदनुमा कलंक को मिटाने की जिम्मेदारी को नजरांदाज नहीं कर सकते है। श्री रावत ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होते ही 15 अगस्त 1947 के दिन से ही देश को अपना नाम भारत व अपने देश की भाषाओं में देश को संचालित किया जाना चाहिए था। परन्तु देश के अंग्रेजी गुलाम मानसिकता से ग्रसित हुक्मरानों ने देश की लोकशाही, आजादी, मानवाधिकारों व संस्कृति को नजरांदाज करते हुए देश को 73 सालों से बेशर्मी से उन्हीं अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी व उनके द्वारा बलात थोपे गये इंडिया नाम का ही गुलाम बनाये हुए है। जिन अंग्रेजों ने भारत को दो सो साल तक गुलाम बनाया, भारत के लाखोें देशभक्तों का कत्लेआम किया। यही नहीं भारत की अरबों खरबों की अकूत सम्पति को लूटकर जहां ब्रिटेन ले गये वहीं इसके साथ अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति से बलात वंचित करने के लिए जबरन भारतीय भाषाओं व भारतीय नाम को मिटाने के लिए 1835 में इंग्लिश एडूकेशन एक्ट थोपा था।  सबसे हैरानी की बात यह है कि संसार में रूस, चीन, जापान, इजराइल, फ्रांस, इटली, जर्मन, कोरिया, टर्की व इंडोनेशिया सहित दुनिया के तमाम देश अपने नाम व अपनी भाषाओं में विकास की कुचालें भर कर विश्व  में अपना परचम लहरा रहे है। वहीं भारतीय हुक्मरानों ने अंग्रेजीयत की इस कदर गुलामी ढो रहे है कि उन्होने अंग्रेजों से मुक्त होने के 73 साल बाद भी देश को अपने नाम व अपनी भाषाओं से वंचित रखा है।  

उल्लेखनीय है ंिक इंडिया बनाम भारत के इस ताजे विवाद तब उठा जब सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला सुनवाई के लिए आया। वह भी सर्वाेच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की बेंच में। इस मामले को दिल्ली के एक निवासी याची ने सर्वोच्च न्यायालय से फरियाद की थी कि देश के नाम इंडिया व भारत के स्थान पर केवल भारत ही रखा जाय। याची ने इंडिया को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसे तत्काल हटा कर देश को उसका गौरवशाली नाम भारत या हिंदुस्तान प्रदान किया जाय। इसके लिए सरकार को संविधान के अनुच्छेद 1 में संसोधन करके इंडिया शब्द हटाने का निर्देश देने की मांग की थी। याची ने तर्क दिया था कि देश को अपने प्राचीन व गौरवशाली नाम से जाना जाय न की गुलामी के प्रतीक नाम से ।
सर्वोच्च न्यायालय ने 3 जून को देश का नाम केवल भारत करने में असमर्थता जाहिर की। सरकार के पास जाने की ऐसी दो टूक बात कहने में भी सर्वोच्च न्यायालय ने 29 मई व 2 जून यानी दो दिन सुनवाई टाल दी थी। सर्वोच्च न्यायालय को भले इस तथ्य की जानकारी नहीं होगी कि इसी गुलामी के कलंक को मिटाने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन नामक एक संगठन पिछले पोने सात साल से सरकार के दर पर निरंतर गुहार लगा रहा है।
भारतीय भाषा आंदोलन 21 अप्रैल 2013 से सतत कर रहा है देश के प्रधानमंत्री से देश को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी से मुक्त करने की मांग
देश का नाम भारत करने व अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए महिनों तक किया जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक सतत पदयात्रा व दिया ज्ञापन।
देश को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी से मुक्ति करके देश का नाम भारत व पूरी व्यवस्था भारतीय भाषाओं में संचालित करने के लिए संसद की चैेखट पर भारतीय भाषा आंदोलन 21 अप्रैल 2013 से सतत आंदोलनरत।
-21 अप्रैल 2013 से 30 अक्टूबर 2018 तक जंतर मंतर, रामलीला मैदान, शहीद पार्क,संसद मार्ग व जंतर मंतर पर 27 दिसम्बर 2018 तक आंदोलन
-28 दिसम्बर 2018 से 18 मार्च 2020 तक जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक पदयात्रा कर प्रत्येक कार्य दिवस पर प्रधानमंत्री कार्यालय में ज्ञापन
-19 मार्च 2020 से कोरोना दंश से मुक्ति तक प्रतिदिन प्रधानमंत्री मोदी से देश को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी से मुक्त करने का खुला आवाहन कर रही है।

भारतीय भाषा आंदोलन का दो टूक सवाल है देश को अंग्रेजी व इंडिया का गुलाम बनाने वाले व्यवस्था के मठाधीशों से कि जब संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, कनाडा, स्वीजरलेंण्ड आदि देश कई भाषाओं में संचालित कर विकास की डगर भर सकते हैं तो भारत अपनी भारतीय भाषाओं में विकास की कूचालें क्यों नहीं भर सकता। हम अंग्रेजी भाषा के विरोधी नहीं। जो फ्रंेच, जर्मन, रूसी,चीनी आदि भाषायें सिखना चाहता है उसका स्वागत। परन्तु किसी की सनक व दुराग्रह के लिए भारत को विदेशी भाषा का गुलाम बनाना राष्ट्रद्रोह है।
भारतीय भाषा आंदोलन का मानना है न्यायपालिका, नौकरशाही, शिक्षा मठ बन गये है अंग्रेेजी की गुलामी के अड्डे। देश की राजनैतिक दल व सरकार हो गयी है देश को अंग्रेजी व इंडिया का गुलाम बनाने के कहार ।
भारतीय भाषा आंदोलन इसी स्थिति को देखकर ही विश्व के तमाम देशों की तरह भारत को अपना नाम भारत व भारतीय भाषाओं द्वारा संचालित कराने की मांग कर रहे है।

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