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भारत दुनिया के 70 प्रतिशत से ज़्यादा गुड़ का उत्पादन  करते हुए, प्राकृतिक मिठास में दुनिया का कर रहा है नेतृत्व 

azadi ka amrit mahotsav

सुपरफूड स्वीटनर


भारत में गुड़ उत्पादन एवं प्रसंस्करण

 16 मई 2026 , दिल्ली से पसूकाभास 

भारत दुनिया के 70 प्रतिशत से ज़्यादा गुड़ का उत्पादन करता हैजिससे वह प्राकृतिक मिठास के मामले में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। देश के गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता हैजिससे लगभग 25 लाख ग्रामीण लोगों को आजीविका मिली हुई है। इस क्षेत्र में निर्यात में भी काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। 2015–16 से 2024–25 के बीच गुड़ के निर्यात के मूल्य में 106.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई हैजो इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग का संकेत है। आयरनमिनरल्स और जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारणगुड़ रिफाइंड चीनी का एक ज़्यादा सेहतमंद विकल्प है। इस बढ़ोतरी को और बढ़ावा देने के लिएसरकार की कई योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री किसान संपदा योजनापीएम सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उन्नयन योजना और एक जिला एक उत्पाद के साथसाथ जीआई टैगिंग भी अहम भूमिका निभा रही हैं। ये योजनाएं उत्पादों की वैल्यू बढ़ानेग्रामीण उद्यमों को मजबूत करने और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाने में मदद कर रही हैं।

 

भारत में गुड़ सेक्टरउत्पादनमहत्व और आजीविका

गुड़, एक पारंपरिक, बिना रिफाइन किया हुआ और प्राकृतिक मीठा पदार्थ है। इसे बिना किसी रसायन का इस्तेमाल किए, गन्ने के रस को गाढ़ा करके बनाया जाता है। इसे अक्सर औषधीय चीनी भी कहा जाता है, और पोषक तत्वों के मामले में यह शहद के बराबर होता है। गुड़ का सेवन एशियाअफ्रीकालैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जहां इसे अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है। गुड़ को प्राकृतिक रुप से बनाने, बनाने के पारंपरिक तरीकों और रसायन-मुक्त मीठे पदार्थों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती पसंद के कारण इसे काफी महत्व दिया जाता है।

दुनिया भर में गुड़ के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा भारत में होता है। इस वजह से भारत दुनिया का सबसे बड़ा गुड़ उत्पादक देश है। देश में गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता है। यह ग्रामीण भारत के प्रमुख कृषिप्रसंस्करण उद्योगों में से एक है। इस क्षेत्र की खासियत विकेंद्रित प्रसंस्करण, परिवहन की कम लागत, छोटे पैमाने पर उद्यमिता और कुटीर उद्योग है। इससे लगभग 25 लाख लोगों की आजीविका चलती है।

 

बढ़ती मिठासभारत की बढ़ती गुड़ अर्थव्यवस्था

 

भारत के गुड़ क्षेत्र को गन्ने के भारी उत्पादन का लाभ मिलता है। वर्ष 2024-25 में, गन्ने का कुल उत्पादन 444.9 मिलियन टन (एमटीरहने का अनुमान था। कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का योगदान 48.5 प्रतिशत रहा, जिसके बाद महाराष्ट्र (24.1 प्रतिशत) और कर्नाटक (10.5 प्रतिशत) का स्थान था। अन्य उत्पादक राज्यों में गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और हरियाणा शामिल हैं।1

भारत गुड़ और कन्फेक्शनरी उत्पादों (जिनमें पारंपरिक भारतीय मिठाइयां और टॉफियां शामिल हैं) के प्रमुख निर्यातकों में से एक है। वर्ष 2015-16 में, 292.8 मीट्रिक टन निर्यात हुआ जिससे 197 मिलियन अमेरिकी डॉलर मिले। वर्ष 2024-25 तक निर्यात बढ़कर 471.9 मीट्रिक टन हो गया जिससे 406.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुए। इस अवधि के दौरान, मूल्य में लगभग 106.5 प्रतिशत और मात्रा में 61.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।2 वर्ष 2024-25 में निर्यात के प्रमुख ठिकानों में इंडोनेशियाअमेरिकासंयुक्त अरब अमीरात (यूएई), नाइजीरिया और नेपाल शामिल थे। 3

अगर हम साल-दर-साल बढ़ोत्तरी की तुलना करें, तो अप्रैल-जनवरी (2025-26) के दौरान निर्यात 450.1 मिट्रिक टन तक पहुंच गया, जिसका मूल्य 384.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। यह 2024-25 की इसी अवधि की तुलना में मात्रा में लगभग 16.5 प्रतिशत और कीमत में 15.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है, जब निर्यात 386.2 मिट्रिक टन था और  मूल्य  331.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर था।

प्राकृतिक स्वीटनर्स की घरेलू मांग भी बढ़ी है। स्वीटनर क्षेत्र में, गुड़ और शहद ने 2021-24 के दौरान 15–20 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की है। घरेलू बाजारों में गुड़ की बिक्री अगस्त 2024 तक सालाना लगभग 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी। यह पारंपरिक और प्राकृतिक मीठे उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती पसंद को दर्शाता है।

 

भारत की गुड़ परंपरा की प्राचीन जड़ें

 

गुड़ को व्यापक रूप से एक स्वदेशी भारतीय उत्पाद माना जाता है। इसका इतिहास गन्ने की खेती और उसके प्रसंस्करण से गहराई से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है। गन्ने की खेती का शुरुआती जिक्र भारतीय ग्रंथों में लगभग 1400–1000 ईसा पूर्व के आसपास मिलता है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि गन्ने की शुरुआती पतली किस्में पूर्वोत्तर भारत के नमी वाले इलाकों में विकसित हुईं। समय के साथ, गन्ने की खेती उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में फैल गई, जिससे यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक फसल बन गई। “शुगर” शब्द संस्कृत शब्द ‘शर्करा‘ से लिया गया है, जो इस उपमहाद्वीप में मीठा उत्पादन की सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है। ऐतिहासिक विवरणों से पता चलता है कि 647 ईस्वी में, एक चीनी प्रतिनिधिमंडल गन्ना प्रसंस्करण तकनीक सीखने के लिए मगध गया था। यह मीठा उत्पादन में भारतीय ज्ञान के शुरुआती प्रसार को दर्शाता है। खेती, प्रसंस्करण और ज्ञान के आदान-प्रदान की इस लंबी परंपरा ने गुड़ उत्पादन में भारत को प्रमुख बनाया।

 

पोषण और जन स्वास्थ्य के लिए गुड़

 

गुड़ को अब एक ‘सुपरफूड’ के तौर पर ज्यादा से ज्यादा  पहचाना जा रहा है।  यह रिफाइंड चीनी का एक प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर विकल्प है। गुड़ को गन्ने के गाढ़े रस से, बिना किसी रासायनिक रिफाइनिंग के बनाया जाता है। इसलिए, इसमें वे जरूरी खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व बने रहते हैं, जो आमतौर पर चीनी को साफ करने की प्रक्रिया के दौरान नष्ट हो जाते हैं। भारत में, गन्ने से अलग-अलग उत्पादन विधियों के जरिए गुड़खांडसारी और चीनी बनाई जाती है। इन तीनों में से, गुड़ को सबसे प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है, और यह पोषक तत्वों के मामले में भी सबसे ज़्यादा समृद्ध है। गुड़ का इस्तेमाल कई तरह के पारंपरिक व्यंजनों में, और साथ ही तरल रूप में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और उपभोक्ताओं के प्राकृतिक मिठास की ओर बढ़ते रुझान के कारण, गुड़ की मांग लगातार बढ़ रही है।

अपने पारंपरिक उपयोग के अलावा, गुड़ को अब बेकरी और कन्फेक्शनरी उत्पादों जैसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में एक ज्यादा सेहतमंद मीठे के तौर पर भी पहचाना जा रहा है। इस क्षेत्र के लगातार विस्तार के साथ, गन्ने का गुड़ताड़ का गुड़ और कच्चा गुड़ जैसे गुड़ के अलग-अलग प्रकार बाजार में अपनी जगह तेजी से बना रहे हैं। यह बदलाव प्राकृतिक और कम से कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के प्रति उपभोक्ताओं की बदलती पसंद को दिखाता है।

 

गुड़ का पोषण मूल्य

 

गुड़ गन्ने के रस में मौजूद जयादातर पोषक तत्वों को बनाए रखता है, जिससे यह सबसे ज्यादा पोषक तत्वों वाले प्राकृतिक मीठे पदार्थों में से एक बन जाता है। यह कैल्शियममैग्नीशियमपोटैशियमफॉस्फोरससोडियमआयरनजिंककॉपर और मैंगनीज जैसे खनिजों को सुरक्षित रखता है, जो सफेद चीनी बनाने की कड़ी रिफाइनिंग प्रक्रिया में नष्ट हो जाते हैं। अच्छी क्वालिटी के गुड़ में आमतौर पर 70 प्रतिशत से ज्यादा सुक्रोज, थोड़ी मात्रा में ग्लूकोज और फ्रक्टोज, और लगभग 5 प्रतिशत खनिज होते हैं, जिसमें नमी की मात्रा कम होती है। आयरन की मात्रा (हर 100 ग्राम में लगभग 10-13 एमजी) हीमोग्लोबिन के स्तर को बेहतर बनाने में मदद करती है, जबकि पोटैशियम और मैग्नीशियम ह्रदय संंबंधी और मांसपेशियों के काम को ठीक रखने में सहायक होते हैं।

गुड़ में विटामिन की  बहुत कम मात्रा होती है, जिसमें फोलिक एसिड और बीकॉम्प्लेक्स विटामिन, साथ ही विटामिन सीडी और  शामिल हैं। ये सूक्ष्म पोषक तत्व गुड़ को एक ऊर्जा से भरपूर भोजन बनाते हैं, जो इन पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में मदद कर सकता है। इसमें खनिज लवण की मात्रा रिफाइंड चीनी की तुलना में काफी ज्यादा होती है। यह इसे आहार पूरक के लिए एक उपयुक्त विकल्प बनाता है, खासकर उन आबादी के लिए जो कुपोषण का शिकार हैं।

 

पोषण उपायों में गुड़ को शामिल करना

तमिलनाडु में बच्चों के कुपोषण को दूर करने और स्कूलों में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए पोषण संबंधी उपायों में गुड़ को शामिल किया गया है। राज्य अपने ‘पौष्टिक भोजन कार्यक्रम’ और एकीकृत बाल विकास सेवा‘ (आईसीडीएस) के तहत बच्चों के लिए पूरक आहार उपलब्ध कराता है। यह आहार, ‘घर ले जाने वाले राशन’  के रूप में, हर साल 300 दिनों तक पात्र लाभार्थियों को वितरित किया जाता है। इस पूरक आहार मिश्रण में गुड़ की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत होती है, जो इसकी ऊर्जा क्षमता और सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है। इस पूरक आहार को आम तौर पर ‘सथुमावु’ के नाम से जाना जाता है। इसे पूरक आहार बनाने वाली 25 महिलासंचालित सहकारी समितियों और दो निजी निर्माताओं से 65:35 के अनुपात में खरीदा जाता है।

 

इन सहकारी समितियों में कुल मिलाकर लगभग 1,450 सदस्य शामिल हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा विधवाओं, परित्यक्त महिलाओं या आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं का है। इस प्रकार, गुड़ पोषण संबंधी सहायता को आजीविका सृजन के साथ जोड़ता है। नीति आयोग के अनुसार, यह कार्यक्रम पूरे तमिलनाडु में लगभग 32.75 लाख लाभार्थियों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराता है। कुपोषण को कम करने के साथ-साथ, यह कार्यक्रम गुड़ जैसे पोषक तत्वों से भरपूर पारंपरिक खाद्य पदार्थों के उपयोग को भी बढ़ावा देता है।

गुड़ के स्वास्थ्य संबंधी फायदे

 

गुड़ से लंबे समय तक ऊर्जा मिलती है क्योंकि इसमें मौजूद जटिल सुक्रोज धीरे-धीरे पचता है। इसलिए यह रक्त में ग्लूकोज के स्तर में अचानक वृद्धि करने के बजाय धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करता है। पारंपरिक लोहे के बर्तनों में तैयार करने के दौरान गुड़ में आयरन अवशोषित हो जाता है, जिससे यह एनीमिया के इलाज में फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद खनिज लवण और सूक्ष्म पोषक तत्व समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं।

आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में, गुड़ का उपयोग लंबे समय से एक औषधीय मीठे पदार्थ के रूप में किया जाता रहा है। आयुर्वेदिक चिकित्सा इसे गले और फेफड़ों के संक्रमण के इलाज में तथा पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में लाभकारी मानती है। इसके शुद्धिकरण गुण श्वसन तंत्र और पाचन तंत्र को विष-मुक्त करने में सहायता करते हैं। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है जो धूल और वातावरण के प्रदूषकों के संपर्क में आते हैं। इसका थर्मोजेनिक (शरीर को गर्मी देने वाला) प्रभाव खांसी, कफ और श्वसन संबंधी अन्य परेशानियों से राहत दिलाने में सहायक माना जाता है।

इसके अलावा, गुड़ को एक प्राकृतिक डिटॉक्सिफाइंग एजेंट माना जाता है जो रक्त को शुद्ध करने में सहायक होता है। यह भी माना जाता है कि यह थकान को कम करता है, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को आराम देता है, और रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस और जिंक जैसे आवश्यक खनिजों की मौजूदगी हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है। इसके कथित विष-रोधी और संभावित कैंसर-रोधी गुण शरीर के संपूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य में योगदान देते हैं।

 

गन्ने से आजीविका तकग्रामीण विकास में गुड़ की भूमिका

 

भारत में गुड़ का उत्पादन असंगठित कृषिप्रसंस्करण क्षेत्र का एक हिस्सा है। यह ग्रामीण आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक के तौर पर, यह क्षेत्र किसानों को सहारा देता है, साथ ही घरेलू खपत और बढ़ती निर्यात मांग दोनों को पूरा करता है।

 

जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की पसंद बदल रही है और वैश्विक मांग बढ़ रही है, गन्ने के वैल्यू चेन में विविधता लाना जरूरी हो गया है। ऐसा इसलिए जरूरी है ताकि खेती से किसानों की आय बढ़ाई जा सके और पर्यावरण एवं आर्थिक रूप से टिकाऊ उत्पादन प्रणालियां सुनिश्चित की जा सकें। गुड़ उत्पादन के जरिए मूल्य संवर्धन करने से, मिलों को कच्चा गन्ना बेचने की तुलना में काफी ज्यादा मुनाफा मिलता है। अनुभवजनित प्रमाणों से पता चलता है कि गुड़ उत्पादन को फसल विविधीकरण और अंतर्फसली खेती जैसी पद्धतियों के साथ जोड़ने से, प्रति इकाई क्षेत्र से होने वाले शुद्ध मुनाफे में काफी सुधार हो सकता है।

 

गुड़ प्रसंस्करण, उद्यमिता को बढ़ावा देकर, स्थानीय रोजगार पैदा करके और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करके ग्रामीण विकास में योगदान देता है। गुड़ प्रसंस्करण पूरे साल रोजगार के अवसर पैदा करता है और प्रवासी मज़दूरों को काम दिलाने में मदद करता है। अच्छी क्वालिटी का गुड़ बनाने से किसानों को प्रीमियम बाजारों तक पहुंच मिलती है, जिससे उनकी आमदनी बढ़ती है। इस तरह, गुड़ पर आधारित कुटीर उद्योग को सशक्त बनाने से मूल्य संवर्धन, आजीविका में सुधार और समावेशी कृषि विकास को बढ़ावा मिलता है।

 

 मुनाफे वाले मूल्यसंवर्धन उद्यम के रूप में ऑर्गेनिक गुड़ पाउडर

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के एक किसान, एंथनीसामी ने गुड़ उत्पादन को एक मूल्यवर्धित उद्यम के तौर पर सफल बनाकर दिखाया है। वह ऑर्गेनिक गुड़ का पाउडर बनाते हैं। उनका यह उत्पाद अपनी शुद्धता और बेहतरीन स्वाद के लिए जाना जाता है। इसकी मांग स्थानीय बाजारों, पड़ोसी राज्यों और यहां तक कि निर्यात चैनलों में भी काफी बढ़ गई है। ऑर्गेनिक खेती के तरीकों को अपनाकर और गन्ने की एक स्थानीय किस्म को प्रसंस्कृत करके, उन्होंने एक पारंपरिक काम को एक मुनाफे वाले उद्यम में बदल दिया है।

इस मूल्य-वर्धित  तरीके से मुनाफा काफी बढ़ गया है। किसान के मुताबिक, ऑर्गेनिक गुड़ का पाउडर लगभग 75 रुपये प्रति किलो बिकता है, जबकि आम गुड़ 50 रुपये प्रति किलो बिकता है। दोनों के लिए उत्पादन लागत लगभग 30 रुपये प्रति किलो है।

हालांकि उत्पादन मौसमी होता है, लेकिन गुड़ की बाजार में मांग पूरे साल बनी रहती है, जिससे लगातार आमदनी के मौके मिलते रहते हैं। इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए, गुड़ के स्वाद वाली चॉकलेट और नारियल जैसे अलग-अलग तरह के उत्पाद बाजार में उनकी पहुंच को और बढ़ा रहे हैं। केंद्र सरकार के सहयोग से चल रहा यह उद्यम दिखाता है कि छोटे पैमाने पर प्रसंस्करण करके कैसे आमदनी बढ़ाई जा सकती है, ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा सकता है और खेती पर आधारित आजीविका को मज़बूत बनाया जा सकता है।

गुड़ मूल्य शृंखला को सशक्त बनानाभारत की गुड़ पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने वाली नीतिगत पहल

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) कई केंद्रीय योजनाओं के जरिए खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अवसंरचना के विकास और उद्यमों के विकास को बढ़ावा देता है। इनमें शामिल हैं:

  • प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई),
  • खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादनआधारित प्रोत्साहन योजना ( पीएलआईएसएफपीआई), और
  • प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना  (पीएमएफएमई

ये मांग-आधारित पहलें पूरे देश में लागू की गयी हैं। ये आधुनिक तकनीकों को अपनाकर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और विस्तार में मदद करती हैं। लाभार्थी इकाइयों को भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआईके नियमों का पालन करना जरूरी है। उन्हें निर्यात में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है।

 

पीएमकेएसवाई का एक घटक खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षण क्षमताओं का निर्माण/विस्तार‘ (सीईएफपीपीसी है। इसके तहत 31 दिसंबर, 2025 तक गुड़ प्रसंस्करण की पांच इकाइयों को मंजूरी दी गई है। इसके लिए कुल अनुदान 17.07 करोड़ रुपये का था। पीएमएफएमई योजना ने 3,528 गुड़आधारित सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को कुल 102.31 करोड़ रुपये की सब्सिडी देकर सहायता प्रदान की है। यह योजना समूहों को 50 प्रतिशत तक की ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता भी प्रदान करती है। इनमें किसानउत्पादक संगठन (एफपीओ), स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), सहकारी समितियांया सूक्ष्म उद्यमों के स्पेशल पर्पस व्हीकल्स शामिल हो सकते हैं।

एक ज़िला एक उत्पाद‘ (ओडीओपी) योजना, कच्चे माल की खरीद, साझा सेवाओं और बाजार तक पहुंच में बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को सक्षम बनाकर स्थानीय कृषि-आधारित उद्योगों को बढ़ावा देती है। 19 जिलों में गुड़ और उससे जुड़े उत्पादों को ओडीओपी वस्तुओं के रूप में पहचाना गया है। इससे वैल्यू चेन  के विकास को बढ़ावा मिला है और सहायक बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ है।

गुणवत्ता आश्वासन और मानकीकरण को विपणन और निरीक्षण निदेशालय (डीएमआई) के माध्यम से समर्थन दिया जाता है। जो कृषि उत्पाद निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं, उन्हें एगमार्क प्रणाली के तहत प्रमाणित किया जाता है। ये मानक गुणवत्ता श्रेणियों को परिभाषित करते हैं और उपभोक्ताओं को विश्वसनीय उत्पाद उपलब्ध कराते हैं। ये उत्पादकों के लिए उच्च कोटि का कच्चा माल और किसानों के लिए लाभकारी मूल्य भी सुनिश्चित करते हैं। गुड़ एक अधिसूचित उत्पाद है जो एगमार्क प्रमाणीकरण के अंतर्गत आता है जिससे गुणवत्ता आश्वासनबाजार में विश्वसनीयता और निर्यात की तत्परता सुदृढ़ होती  है।

 

भारत में भौगोलिक संकेतक(जीआईटैग प्राप्त गुड़ की किस्में

 

भौगोलिक संकेत (जीआई) एक ऐसा नाम या चिह्न है जो कुछ खास उत्पादों को दिया जाता है, जिनका संबंध किसी विशिष्ट भौगोलिक स्थान या मूल से होता है। यह कोई क्षेत्र, कस्बा या देश हो सकता है। गुड़ के क्षेत्र में, जीआई मान्यता क्षेत्रीय ब्रांडिंग को मजबूत बनाती है। यह पारंपरिक प्रसंस्करण विधियों को बढ़ावा देती है और ग्रामीण उत्पादकों के लिए बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाती है। भारत में जीआई-टैग वाले गुड़ की कई किस्में हैं, जिनमें से हर एक अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय खूबियों और पारंपरिक प्रसंस्करण विधियों के लिए जानी जाती है। कोल्हापुर का गुड़ (महाराष्ट्र) अपने सुनहरे रंग और सुक्रोज़ की उच्च मात्रा के लिए सराहा जाता है। मुजफ्फरनगर  का गुड़ (उत्तर प्रदेश) निर्यातोन्मुख है और उच्च गुणवत्ता वाले गन्ने से बनाया जाता है। केरलम मेंमरायूर और मध्य त्रावणकोर के गुड़ को उनकी शुद्धता, औषधीय गुणों, पारंपरिक प्रसंस्करण और क्षेत्रीय विशिष्टता के लिए जाना जाता है।

 

एक सुदृढ़ एवं मूल्यआधारित गुड़ सेक्टर  की ओर

 

गुड़ का उत्पादन और उसका प्रसंस्करण भारत की कृषिआधारित अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। यह कृषिपोषणग्रामीण आजीविका और निर्यात की संभावनाओं को आपस में जोड़ता है। दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते, भारत को गन्ने की भरपूर पैदावार का फायदा मिलता है। प्रसंस्करण का पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक मिठास की घरेलू और वैश्विक मांग में हो रही बढ़ोतरी भारत की संभावनाओं को और भी मजबूत बनाती है। यह क्षेत्र विकेंद्रित कुटीर उद्योगों के जरिए लाखों लोगों की आजीविका का सहारा बनता है, और मूल्य संवर्धनग्रामीण उद्यमिता तथा किसानों की आय बढ़ाने के अवसर प्रदान करता है।

आर्थिक भूमिका के अलावा, गुड़ में मौजूद खनिज तत्व और औषधीय गुण इसे रिफाइंड चीनी का एक ज्यादा सेहतमंद विकल्प बनाते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए यह एक उपयोगी आहार पूरक है। खाद्य प्रसंस्करण के बुनियादी ढांचे, सूक्ष्म उद्यमों, गुणवत्ता प्रमाणन, जीआई टैगिंग और वैल्यू चेन के विकास को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलें, बाजार तक पहुंच और उत्पाद की विश्वसनीयता को मजबूत कर रही हैं। लगातार मिल रहे नीतिगत समर्थन, प्रसंस्करण के बेहतर तरीकों और मूल्य-वर्धित उत्पादों की ओर बढ़ते विविधीकरण के साथ, गुड़ के क्षेत्र में समावेशी और टिकाऊ ग्रामीण विकास को गति देने की अपार क्षमता मौजूद है।

संदर्भ

 

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

https://apeda.gov.in/JaggeryAndConfectionery

https://apeda.gov.in/Food_Agri_Products_Registered_GI

https://agriexchange.apeda.gov.in/production/India/index

https://agriexchange.apeda.gov.in/India/ExportSummary/Index

https://agriexchange.apeda.gov.in/India/ExportAnalyticalReport/Index

https://agriexchange.apeda.gov.in/India/ComparativeStatement/Index

https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2113966&reg=3&lang=2

https://apeda.gov.in/sites/default/files/study_reports/Report_Indian_Organic_Market_and_Export_Promotion_Strategy.pdf

 

 कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

https://www.agriwelfare.gov.in/Documents/AR_Eng_2024_25.pdf

 

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय

https://niftem-t.ac.in/pmfme/DPR-Jaggery.pdf

https://www.mofpi.gov.in/mediapr/enewsfeb4.html

https://niftem.ac.in/newsite/pmfme/wp-content/uploads/2022/08/jaggeryprocessing.pdf

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/187/AU116_pneN8S.pdf?source=pqals

 

नीति आयोग

https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2024-07/Report-on-Promoting-Best-practices-on-Millet-26_4_23.pdf

 

तमिलनाडु सरकार

https://cuddalore.nic.in/geographical-indications/

https://agritech.tnau.ac.in/success_stories/sstories_farm_enter_2015_organic_jaggery.html

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