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शाबास हिमाचल, जिसने भाजपा के बाद कांग्रेस के मठाधीशों को उतराखण्ड समझने की भूल करने पर सिखाया करारा सबक

आंध्र प्रदेश  की तरह भूल करने का खमियाजा भुगत रही है हिमाचल में कांग्रेस
देवसिंह रावत
अप्रेल 2024 में रिक्त होने वाले 15 राज्यों की 56 राज्यसभा के लिये 27 फरवरी 2024 को हुये महत्वपूर्ण चुनाव में भले ही भाजपा ने मोर्चा मार लिया हो। अब 240 सदस्यीय राज्यसभा में भाजपा इन नये सांसदों की बदोलत 97 संख्या अर्जित कर सबसे बडी पार्टी बन गयी है। वहीं भाजपा का राजग गठबंधन 117सीटे जीत चूका है। यानि बहुमत से 4 सीटें की हम है। यहां कांग्रेस 29, तृणमूल-13, दु्रमुक व आप-10-‘10, बीजद व वाईआरएस 9-9, बीआरएस-7,राजद-6, माकपा-5 व अनाद्रुमुक व जदयू4-4 हो जायेंगी।
भले ही भाजपा को कर्नाटक में मात खानी पडी। वहां कांग्रेस ने उसके खेमे में सेंध मार कर कर्नाटक में तीसरी सीट भी अपनी झोली में डाल दी। भाजपा ने उप्र की 10 सीटों पर हुये चुनाव में भाजपा ने जहां उप्र में सपा में सेंध लगा कर अपना 8वां प्रत्याशी भी जिताने में सफलता अर्जित की हो पर सबसे गहरा झटका भाजपा ने हिमाचल में हुये एक सदस्यीय चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस को दिया। इस झटके से न केवल कांग्रेस की  नेतृत्व की संगठनात्मक उदासीनता व भूल उजागर हुई अपितु वहां उनकी इस भूल के कारण अपनी मजबूत सरकार की भी चूलें हिला दी।
68 सदस्यीय हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के पास 40 विधायकों का पर्याप्त बहुमत था। परन्तु यहां प्रदेश में मात्र 25 विधायक संख्या वाली भाजपा की रणनीति के उजागर होने के बाबजूद कांग्रेस सजग नहीं हुई। भाजपा ने जिस रणनीति से यहां पर हिमाचल प्रदेश के महान नेता व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र के नजदीकी रणनीतिकार हर्ष महाजन को अपना प्रत्याशी बनाया। वहीं कांग्रेस से सत्तामद में यहां पर देश के दिग्गज अधिवक्ता ए एम सिंधवी को अपना प्रत्याशी बनाया। संख्या की दृष्टि से देखा जाय तो सिंधवी यानी कांग्रेस की जीत साफ थी। हिमाचल में 3 स्वतंत्र विधायक भी थे। कांग्रेस नेतृत्व ने यहां फिर भूल कर दी। गैर हिमाचल प्रदेश के निवासी को यहां से उम्मीदवार बना कर। परमार से वीरभद्र तक के शासन में हिमाचल में जनता व जनप्रतिनिधियों में प्रदेश की हितों की रक्षा करने की भावना कूट कूट कर भरी है। इसका जीता जागता उदाहरण प्रदेश में भू कानून व मूल निवास  तथा वहां की राजनीति है। हिमाचल की जनता अपने योग्य नेताओं का दिल से सम्मान करते है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को पटकनी देने के बाद कांग्रेस ने यहां पर फिर आंध्र प्रदेश की तर्ज पर भूल कर दी। जहां रेड़डी के सत्ता के दावेदार सक्षम पुत्र जगन रेड़डी को नजरांदाज व अपमानित कर प्रांत में कांग्रेस की जड्डों में मठ्ठा डालने के लिये विवश कर दिया। कांग्रेस का नेतृत्व केवल गांधी परिवार के अलावा किसी परिवार को मजबूत न करने देने की आत्मघाती रणनीति के कारण आंध्र के बाद आज हिमाचल भी उसके हाथों से खिसकने वाला है। हो सकता है कांग्रेस नेतृत्व ने अपने उपर भाजपा द्धारा लगाये जा रहे परिवारवाद के प्रहारों से बचने के लिये हिमाचल में दिवंगत वीरभद्र के परिजनों को सत्तासीन करने के बजाय अपने मजबूत सिपाहेसलार सुखवींदर सिंह सुक्खु की ताजपोशी की हो। परन्तु सुक्खु सरकार ने वीरभद्र समर्थकों नेताओं को जिस प्रकार हासिये में डालने का  काम किया और हिमाचल को आदर्श व खुशहाल प्रदेश बनाने में परमार के बाद सबसे अधिक योगदान देने वाले मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की मूर्ति तक को शिमला के सम्मानजनक स्थान में न लगाने देने की हटधर्मिता की, उससे उपजे असंतोष का भान होने के बाबजूद उसका सम्मानजनक समाधान न करने के कारण भाजपा को कांग्रेस के अंदर पनपे असंतोष को हवा देकर पटकनी देने के लिये हर्ष महाजन जैसे कांग्र्रेस में पकड रखने वाले नेता का ब्रह्मस्त्र का संधान से कांग्रेस राज्यसभा चुनाव में चारों खाने चित हो गयी। यही नहीं प्रदेश की कांग्रेस सरकार की नींव भी हिल गयी। जिस ढंग से कांग्रेस के 6 विधायकों ने अपने घोषित प्रत्याशी सिंघवी के खिलाफ मतदान दे कर भाजपा के प्रत्याशी हर्ष महाजन का समर्थन किया। उससे कांग्रेस को जोरदार तमाचा लगा। इसके साथ भले ही अपनी सरकार बचाने के प्रयास में कांग्रेस ने इन 6 विधायकों की सदस्यता रद्द भी करा दी हो और कबीना मंत्री विक्रमादित्य सिंह जो वीरभद्र के पुत्र है का दिया गया इस्तीफा भी वापस करा लिया हो, पर कांग्रेस सरकार हिमाचल की शांत वादियों में भी अस्थिर हो  गयी है। यह अस्थिरता कांग्रेस नेतृत्व की उदासीनता व आंध्र प्रदेश की तर्ज पर की गयी भूल से हुआ। देर सबेर भाजपा, जो आज केंद्र में आसीन है वह कहीं भी विपक्ष खासकर कांग्रेसी सरकार को सहन करने के लिये मन से तैयार न हो। ऐसी स्थिति में ऐसी भूलें व उदासीनता कांग्रेस के लिये आत्मघाती साबित हुई। यह जानते हुये भी कि हिमाचल में गैर हिमाचली को प्रदेश के हक हकूकों पर सेंघ लगाने को सहन करने की मनोवृति  नहीं है। भाजपा व कांग्रेस को हिमाचल के पडोसी राज्य उतराखण्ड सा पहाडी राज्य समझने की भूल थी। भाजपा को तो हिमाचल के नेताओं व जनता ने पहले सबक सिखा दिया था। यहां जब महेंद्र पाण्डे जो वर्तमान में भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में कार्यरत है, वे उस समय हिमाचल भाजपा के संगठन महामंत्री थे, लम्बे समय से हिमाचल की राजनीति में दखल रखते थे। जब केंद्रीय भाजपा नेतृत्व ने धूमल सरकार के समय हिमाचल से उन्हें राज्य सभा का प्रत्याशी बनाने का मन बनाया तो हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध गैर हिमाचली की तर्ज पर किया। उल्लेखनीय है कि महेंद्र पाण्डे उतराखण्ड में सोमेश्वर क्षेत्र के मूल निवासी है। हिमाचल के प्रांतीय नेताओं की भावना के आगे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी झुकना पडा। महेंद्र पाण्डे के बजाय दूसरे प्रत्याशी को उतारा गया। भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली आकाओं को लगा था कि हिमाचल भी उतराखण्ड की तरह खुली धर्मशाला है किसी को भी थोप दो, बाघ बंदर से लेकर लाखों घुसपेटियों को घुसेड दो, उतराखण्ड के जनप्रतिनिधियों व जनता को कोई असर नहीं पडता। इसके बाबजूद वे बंधुआ मजदूर की तरह भाजपा व कांग्रेस के झडेबरदार बने रहते। अपनी आन मान सान को रौदने के बाबजूद। सब कुछ लुटने के बाद अब उतराखण्ड भी जरा अंगडाई ले रहा  है। राजधानी गैरसैंण, भू-मूल निवास कानून, जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीन, मुजफरनगर काण्ड, हल्द्धानी-जोशीमठ-उतरकाशी प्रकरण व अंकिता भण्डारी प्रकरण आदि प्रकरणों पर। उतराखण्ड की सत्ता व महत्वपूर्ण संस्थानों के पदों पर किसी को भी थोप दो।
आज हिमाचल  प्रदेश अपने स्वाभिमान व अस्तित्व रक्षा करने की लडाई लड रहा है। यह जगजाहिर है कि उतराखण्डी की सरकार व जनप्रतिनिधी उतराखण्ड के हक हकूकों, सम्मान व जनभावनाओं का सम्मान करने में पूरी तरह असफल रहे।  हिमाचल के गौरवशाली महापुरूषों की स्मृतियां मिटाने को तुली कांग्रेस को यह सजा मिलनी चाहिये थी। वह हिमाचल के नेता व जनता समय समय पर सजग हो कर करते है। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व विक्रमादित्य का मर्माहित होना स्वाभाविक है। हिमाचल कांग्रेस सरकार को यह भूल नहीं करनी चाहिये। सजग होना चाहिये था भाजपा के वारो से। हर्ष महाजन भले ही विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में चले गये थे पर उनकी पकड भाजपा से अधिक कांग्रेस में बनी हुई थी। भले ही भाजपा की विरोधी दलों की सरकार ऐन केन प्रकार से गिरा देने की प्रवृति उचित नहीं है। अगर कहीं सरकार गिरानी चाहिये तो वंगाल में गिरानी चाहिये थी। जहां कानून व्यवस्था के साथ देश की अखण्डता खतरे में है। पर वहां कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है।

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