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कोरोना महामारी के बाद बंदर चेचक(मंकीपॉक्स) रोग के आतंक से सहमी है दुनिया

स्वास्थ्य माफियाओं के चक्रव्यूह में फंसी दुनिया की कौन करेगा रक्षा?

 

देव सिंह रावत

आज के दिन दुनिया के 7 अरब 96 करोड यानी 796 करोड लोग कोरोना महामारी(कोविड 19) के साथ बंदर चेचक (मंकीपॉक्स) रोग के आतंक से सहमी हुई है। आम लोगों के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि आखिर इस संसार को स्वास्थ्य माफियाओं के चुंगल से दुनिया को कौन बचाएगा?
जिस प्रकार से कोरोना महामारी के दौरान विश्व को स्वास्थ्य माफियाओं के हाथों आम जनता लूटी मरी उससे हैरान परेशान जनता विश्व में तेजी से फैल रही बंदर चेचक (मंकीपॉक्स) बीमारी से भयभीत है। जिस प्रकार से कोरोना महामारी की तरह बंदर चेचक भी जानवरों से इंसानों में फैलाया गया रोग बताया जा रहा है। इस समय पूरे विश्व में तेजी से फैल रहा बंदर चेचक मंकीपॉक्स महामारी भी बंदर आदि जानवरों के संसार की से ही इंसानों में आने वाली महामारी बताई जा रही है। हालांकि बंदर चेचक (मंकीपॉक्स) रोग 1950 से अफ्रीका महाद्वीप में पाए जाने वाला आम रोग है परंतु जिस तेजी से वर्तमान में इसको पूरे विश्व में फैलाया जा रहा है उससे इन आरोपों को बल मिलता है की स्वास्थ्य माफिया अपने निहित स्वार्थ के लिए संसार भर में ऐसी महामारी आ फैलाकर अपनी तिजोरिया भरने का षड्यंत्र कर रही है। जिस प्रकार से हथियारों के निर्माता व सौदागर विश्व के विभिन्न देशों के बीच जबरन युद्ध करवा कर अपना व्यापार बढ़ा रहे हैं कहीं उसी तरह से स्वास्थ माफिया भी विषाणु रोगों को फैला कर संसार भर के लोगों को लूटने का यह हथकंडा महामारी के नाम पर चला रहे हैं। पहले के जमाने में चिकित्सालय व चिकित्सक लोगों को स्वस्थ करने की प्राथमिकता से इलाज करते थे। परंतु अब जब से चिकित्सा को व्यापार में तब्दील किया गया तब से दवाई चिकित्सालय आदि सभी जगह केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण से कार्य किया जा रहा है। कोरोना महामारी में निजी स्वास्थ्य सेवाओं व स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य व्यवसायियों ने जिस प्रकार से अंध दोहन किया उससे आम जनता बेहद त्रस्त है।
जिस प्रकार से कोरोना महामारी के दौरान खबरें प्रमुखता से जग जाहिर हुई थी चीन में चमगादडों से फैली इस बीमारी से संसार भर के करोड़ों लोग मारे गए। कोरोना बीमारी के पीछे भी यह आशंका प्रकट की गई चीन में यह महामारी विषाणु युद्ध के लिए अपने प्रयोगशालाओं में बनाई वह रणनीति के तहत फैलाई। क्योंकि इस महामारी से जिस प्रकार से चीन के दो प्रमुख विरोधी देशों अमेरिका वह भारत के अलावा यूरोपीय देशों में भी लाखों लोग मारे गए और चीन के तत्कालीन क्रियाकलाप संदिग्ध नजर आए। उससे परिस्थिति जन्य तमाम साक्ष्य एक स्वर में चीन को ही इस महामारी को फैलाने का गुनाहगार साबित करती है। परंतु चीन के तिकड़म के कारण जिस प्रकार से विश्व स्वास्थ्य संगठन की संदिग्ध भूमिका रही। उससे इन आशंकाओं को बल मिला की बड़ी खतरनाक षड्यंत्र विश्व में अपने वर्चस्व के लिए तमाम ताकतें कर रही हैं। इसमें यह विषाणु प्रहार भी इसका एक जीता जागता नमूना है। दुनिया को इस आतंक से कौन बचाएगा दो गुटों में बटा संयुक्त राष्ट्र संघ से कोई आशा नहीं की जा सकती है। दुनिया में ऐसा कारगर संस्थान होना चाहिए जो दुनिया भर के इन विषाणु व्यापार व चिकित्सा सौदागरों पर (विषाणु का निर्माण कर उसे संसार भर में फैलाने वालों पर) कड़ा अंकुश लगाये।

बंदर चेचक (मंकीपॉक्स) रोग का पहला मामला 1950 के दशक में सामने आया था। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने 1958 में इस बीमारी की पहचान सबसे पहले की थी, जब शोध करने वाले बंदरों में चेचक जैसी बीमारी के लक्षण दिखाई दिए इसलिए इसे बंदर चेचक यानी मंकीपॉक्स कहा जाता है। सबसे पहले 1970 में कांगो में एक 9 साल के लड़के में यह रोग देखा गया।

जैसे ही दुनिया में 1980 में चेचक के उन्मूलन के ऐलान के साथ उसके इलाज में प्रयोग होने वाले स्मॉल पॉक्स के टीकाकरण की समाप्ति का ऐलान किया जाता है वैसे ही बंदर चेचक अफ्रीका के कई देशों में तेजी से फैलने लगा।
भले ही यह बंदर चेचक रोग कोरोना महामारी की तरह जानलेवा नहीं है परंतु पूरी दुनिया इसके को प्रचार के कारण आशंकित व आतंकित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह उतना घातक नहीं है चेचक के टीके का भी इस रोग के उपचार में सहायक पाया गया है।
बंदर चेचक नामक यह बीमारी दशकों से अफ्रीकी लोगों में आम है। परंतु कोरोना महामारी के बाद कुछ महीनों से जिस तेजी से इस बीमारी को पूरे संसार में फैलाया जा रहा है वह अपने आप में किसी बड़े षड्यंत्र का संकेत ही दे रहा है।
अब तक दुनिया भर में 16,000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह घातक जानलेवा रोग नहीं है अभी तक इस बंदर चेचक से इन दिनों केवल पांच लोग ही मरे।अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों शाहिद 7 दर्जन से अधिक देशों में इसके मामले सामने आ रहे हैं। ब्रिटेन में ही 2,000
मामले सामने आ चुके हैं। भारत में भी केरल व दिल्ली सहित कई स्थानों पर इसके अभी तक आधा दर्जन संदिग्ध रोगी पाए गए अभी इनकी जांच चल रही है परंतु इस रोग में सावधानी जरूरी है। यह कोरोना की तरह उतना संक्रामक नहीं है। परंतु इसके शिकार रोगी से संपर्क आने से विश्व भर में फैल रहा है।
बंदर चेचक यानी मंकीपॉक्स के रोगी को जब बुखार, सिरदर्द, सूजन, कमर दर्द और मांसपेशियों में दर्द होने लगे।बुखार होने पर त्वचा पर दाने इत्यादि होने लगे। चेचक की तरह इस के दाने भी चेहरे से निकलकर पूरे शरीर के फैल जाते हैं। रोगी के हथेलियों व पैरों के तलवे पर हुए दानों व चटकों पर खुजली व दर्द भी हो सकता है। के साथ अन्य बदलाव भी हो सकते हैं। आमतौर पर यह रोग 14 से 21 दिनों तक रहता है। किस रोग के अंतिम दिनों में शरीर में पपड़ी बनने के बाद में गिर जाती है। जिसके बाद घाव के निशान भी पड़ते हैं। आमतौर पर यह रोग अपने आप ठीक हो जाता है। सुपाच्य वह पौष्टिक खाने के साथ पर्याप्त सोना भी रोगी को इस रोग से उबारने में सहायक होता है। रोगी को इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि त्वचा पर उभरी फुंसियों या चकत्तों पर खुजली करने से बचें और उन्हें समय-समय पर साफ पानी साफ करते रहें।
इस रोग का विषाणु इसके पीड़ित से शारीरिक संपर्क या कपड़ो इत्यादि संपर्क होने पर आंख, नाक या मुंह के रास्ते शरीर में जाता है।

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