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नई शिक्षा नीति से भारतीय भाषाओं को हटाने के बजाय अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाये भारत सरकार

 

72 साल से अंग्रेजी व इंडिया का गुलामी में जकडे भारत की मुक्ति के लिए भारतीय भाषा आंदोलन ने दिया प्रधानमंत्री को पदयात्रा कर ज्ञापन

 

देश को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी से मुक्ति दिलाने की मांग को लेकर भारतीय भाषा आंदोलन के अध्यक्ष देवसिंह रावत के नेतृत्व में भारतीय भाषा आंदोलन ने 3 जून की तपती दोपहरी को जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक पद यात्रा कर दिया ज्ञापन।

 

नई दिल्ली(प्याउ)। देश में नयी शिक्षा नीति को प्रभावी बनाने के लिए प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा सहित पूरी शिक्षा व्यवस्था से भारतीय भाषा हिंदी की अनिवार्यता हटाने के बजाय सरकार को अविलम्ब अंग्रेजी की अनिवार्यता हर स्तर से हटानी चाहिए। यह दो टूक अनुरोध, भारतीय भाषा आंदोलन ने 3 जून की तपती दोपहरी में राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक पद यात्रा कर प्रधानमंत्री को दिये गये ज्ञापन में दिया। देश को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी से मुक्ति दिलाने की मांग को लेकर भारतीय भाषा आंदोलन के अध्यक्ष देवसिंह रावत के नेतृत्व में भारतीय भाषा आंदोलन ने 3 जून की तपती दोपहरी को जंतर मंतर से प्रधानमंत्री कार्यालय तक पद यात्रा कर दिया ज्ञापन। ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में भारतीय भाषा के अध्यक्ष देव सिंह रावत, रामजी शुक्ला, अनिल पंत, हरीराम तिवारी व अशोक ओझा सम्मिलित थे।
17वीं लोकसभा गठित होते ही आपकी सरकार ने पहले ही दिन, देश में राष्ट्र को अंग्रेजी का गुलाम बना पर नौनिहालों को पथभ्रष्ट बना रही वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में कदम उठाने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन की हार्दिक बधाई। परन्तु 1 जून को इस नयी शिक्षा नीति को लागू करने के लिए जो मसौदा देश के प्रख्यात वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाली समिति द्वारा सोंपी गयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2019 सौंपी गयी उसमें प्राथमिक शिक्षा प्रांतीय भाषा(भारतीय भाषा) में देने का सराहनीय सलाह दी गयी। परन्तु इस समिति ने जो त्रिभाषा फार्मूला को सुझाया है वह एक प्रकार से अंग्रेजी को बनाये रखने का एक प्रकार से भारत घाती कदम ही है। हालांकि इस तीन भाषा फार्मूला का भी तमिलनाडू के राजनैतिक दलों व कांग्रेस ने विरोध किया वह अपने आप में इस देश को अंग्रेजी का गुलाम बनाये रखने का एक खौपनाक षडयंत्र है। यह षडयंत्र अंग्रेजों के जाने से पहले ही मैकाले व उसके बाद ‘राष्ट्र मण्डल (काॅमनवेल्थ)सचिवालय द्वारा अपने प्यादों के द्वारा निरंतर संचालित किया जा रहा है। इसी षडयंत्र का एक प्रमुख हिस्सा है हिंदी के नाम पर भारतीय भाषाओं का विरोध अंग्रेजी का राज इस देश में एकछत्र बना कर भारत को गुलाम बनाये रखना। भारतीय हुक्मरानों को अंग्रेजों के जाने के 72 साल बाद भी यह भान नहीं रहा कि भारतीय शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता मुक्त किये बिना न तो शिक्षा भारतीय होगी व नहीं देश में लोकशाही की स्थापना ही होगी। आशा है कि आपकी राष्टवादी सरकार विगत 72 सालों से अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी की जंजीरों में जकडे भारत को इस कलंक से मुक्ति दिलाने के अपने प्रथम संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करेंगे।
देश में 72 सालों से व्याप्त अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के मार्ग में जो राजनैतिक दल अपने निहित स्वार्थ के लिए हिंदी के नाम पर भारतीय भाषाओं का विरोध करने का जो षडयंत्र चल रहा है उसको विफल करने के लिए सरकार को निम्नलिखित महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए-
(1)-संघ लोकसेवा आयोग सहित देश प्रदेश में रोजगार की सभी परीक्षाओं में से अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाकर केवल भारतीय भाषाओं में ली जाय।
(2) सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के बजाय भारतीय भाषाओं में दिया जाय न्याय।
(3) प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा केवल दो भाषा में प्रदान की जाय। नौनिहालों को शिक्षा, मातृभाषा यानी प्रांतीय भाषा व भारतीय भाषाओं में प्रदान की जाय। देश में अंग्रेजी सहित विदेशी भाषाओं के साथ प्राचीन भारतीय भाषाओं को ऐच्छिक विषय के रूप में
(4) शासन प्रशासन भी केवल भारतीय भाषाओं (अंग्रेजी)में संचालित किया जाय।

मान्यवर उपरोक्त कदमों से कोई भी दल व व्यक्ति भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं कर पायेगा। उदाहरण के लिए तमिलनाडू में न्याय व रोजगार जब तमिल में मिलेगा तो विरोध कोई भी दल नहीं कर पायेगा। जो करेगा उसको राष्ट्रद्रोह के तहत फांसी की सजा दी जाय। यहां पर विरोध केवल भारत की शिक्षा, रोजगार,न्याय व शासन के मठों पर काबिज अंग्रेजी के माफिया करते है, उन पर अंकुश लगाये बिना देश में लोकशाही स्थापित नहीं हो सकेगी।
सरकार को इस षडयंत्र को तोड़ने के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता की फांस रोजगार, न्याय व शिक्षा से हटा देनी चाहिए।
मान्यवर आपको विदित ही होगा कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजो से मुक्ति के बाबजूद भी देश के गुलाम मानसिकता के हुक्मरानों ने बेशर्मी से विगत 72 सालों से देश की लोकशाही, सम्मान व मानवाधिकारों को जमीदोज करके देश को अंग्रेजी व इंडिया का गुलाम बनाया हुआ है। दूसरी तरफ पूरे विश्व के चीन, रूस, जर्मन, फ्रांस, जापान, टर्की, इस््रााइल सहित सभी स्वतंत्र व स्वाभिमानी देश अपने देश की भाषा में अपनी व्यवस्था संचालित करके विकास का परचम पूरे विश्व में फंेहरा रहे हैं।परन्तु भारत में अंग्रेजों के जाने के 71 साल बाद भी बेशर्मी से फिरंगी भाषा में ही न केवल राजकाज व न्याय व्यवस्था संचालित की जा रही है अपितु शिक्षा(चिकित्सा, यांत्रिकी, सामान्य)ही नहीं रोजगार व सहित पूरी व्यवस्था अंग्रेजी को ही पद प्रतिष्ठा व सम्मान का प्रतीक बना कर भारत व भारतीय संस्कृति को अंग्रेजियत के प्रतीक इंडिया का गुलाम बनाया जा रहा है।भारतीय भाषा आंदोलन इसी गुलामी के कलंको से माॅ भारती को मुक्त कराने व भारतीय भाषाओं के साथ भारत से देश को महाशक्ति व विश्व गुरू बनाने के लिए 21 अप्रैल 2013 से सतत् सत्याग्रह कर रहे हैं। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि देश की सरकारों ने अपनी राष्ट्रघाती भूल पर तुरंत सुधार करने का काम करने के बजाय देशभक्त आंदोलनकारियों का अलोकतांत्रिक दमन किया गया व आंदोलन को उजाडने का कृत्य किया गया। भारतीय भाषा आंदोलन का मानना है किसी भी स्वतंत्र देश की भाषाओं को रौंदकर विदेशी भाषा में बलात शिक्षा, रोजगार, न्याय व शासन देना किसी देशद्रोह से कम नहीं है। आशा है आपकी सरकार भारत को अंग्रेजी व इंडिया की गुलामी की कलंक से मुक्त करेंगे।

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