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सौर मंडल के लंबे समय से चले आ रहे रहस्यों की पड़ताल से मिल सकती है मौसम पूर्वानुमान में मदद

azadi ka amrit mahotsav

27 मार्च 2026, दिल्ली से पसूकाभास 

सौर ज्वालाओं से उत्पन्न सौर कोरोनल झटकों का अध्ययन कर रहे शोधकर्ताओं ने विभिन्न विस्फोटों के लिए मौलिक (तरंग का आधार स्वर) और हार्मोनिक उत्सर्जन (ओवरटोन) नामक रेडियो तरंगों की सापेक्षिक शक्तियों में विचित्र भिन्नता के पीछे के कारण के बारे में एक लंबे समय से चली आ रही पहेली को सुलझा लिया है।

इस अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि सौर झटके रेडियो तरंगें कैसे उत्पन्न करते हैं और वे तरंगें कोरोना के माध्यम से कैसे यात्रा करती हैं, और यह मौसम पूर्वानुमान में भी सहायक हो सकता है।

सौर ज्वालाओं या कोरोनल मास इजेक्शन से उत्पन्न सौर कोरोनल झटके एक विशेष प्रकार का रेडियो उत्सर्जन उत्पन्न करते हैं, जिसे टाइप II सौर रेडियो विस्फोट के रूप में जाना जाता है। ये विस्फोट, जिन्हें धीमी गति से बहने वाले विस्फोट भी कहा जाता है, आमतौर पर लगभग 1000 किमी/सेकंड की गति से बहते हैं और रेडियो तरंग बैंड में इनका पता लगाया जा सकता है।

टाइप II सौर विस्फोटों की पहचान बहाव दर, वर्णक्रमीय सूचकांक और विभिन्न अन्य प्लाज्मा मापदंडों जैसी विशेषताओं के आधार पर की जाती है और जैसे-जैसे शॉक बाहर की ओर बढ़ता है, वे धीरे-धीरे उच्च से निम्न रेडियो आवृत्तियों की ओर बढ़ते हैं।

टाइप II विस्फोट आमतौर पर दो भागों में दिखाई देते हैं – मौलिक उत्सर्जन और हार्मोनिक उत्सर्जन। सैद्धांतिक रूप से, मौलिक उत्सर्जन के हार्मोनिक उत्सर्जन से अधिक शक्तिशाली होने की उम्मीद है। हालांकि, प्रेक्षणों से पता चलता है कि कुछ मामलों में हार्मोनिक उत्सर्जन मौलिक उत्सर्जन से अधिक शक्तिशाली हो सकता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान- भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के खगोलविदों के नेतृत्व में एक टीम ने उस सवाल का समाधान किया जिसने वैज्ञानिकों को उत्सुक कर रखा था। सवाल था – विभिन्न विस्फोटों के लिए मौलिक और हार्मोनिक उत्सर्जन की सापेक्षिक शक्तियाँ क्यों भिन्न होती हैं।

 

उन्होंने विश्व भर में स्थित कंपाउंड एस्ट्रोनॉमिकल लो फ्रीक्वेंसी लो कॉस्ट इंस्ट्रूमेंट फॉर स्पेक्ट्रोस्कोपी एंड ट्रांसपोर्टेबल ऑब्जर्वेटरी (सीएएलएलआईएसटीओ) उपकरणों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करके 58 टाइप II सौर रेडियो विस्फोटों की उत्पत्ति और विशेषताओं का पता लगाकर इस रहस्य को सुलझाने का प्रयास किया। इससे रहस्य के बारे में नई जानकारी प्राप्त हुई।

 

इस प्रक्रिया के लिए, उन्होंने आईआईए द्वारा संचालित गौरीबिदानूर रेडियो वेधशाला के गौरीबिदानूर लो फ्रीक्वेंसी सोलर स्पेक्ट्रोग्राफ (जीएलओएसएस) का उपयोग करके प्राप्त डेटा का इस्तेमाल किया।

इस अध्ययन के शोधकर्ता के. शशिकुमार राजा ने कहा, “हमारे अध्ययन से पता चलता है कि 75° से अधिक हेलियोग्राफिक या सौर देशांतरों पर स्थित सक्रिय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली घटनाओं में अधिक प्रबल हार्मोनिक उत्सर्जन दिखता है। इसके विपरीत, सौर डिस्क के केंद्र के निकट (75° से कम हेलियोग्राफिक देशांतरों पर) उत्पन्न होने वाली घटनाओं में अधिक प्रबल मौलिक उत्सर्जन होता है। इस तरह के व्यवहार का कारण सौर कोरोना में अपवर्तक प्रभाव, दिशात्मकता और सौर रेडियो उत्सर्जन का प्रेक्षण कोण है। इन प्रभावों के कारण, 75° से अधिक के सक्रिय क्षेत्रों से जुड़ी घटनाएं पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती हैं और इसलिए या तो अनुपस्थित दिखाई देती हैं या कमजोर। हालांकि, हार्मोनिक्स के शंकु कोण व्यापक होते हैं और इसलिए प्रबल उत्सर्जन पृथ्वी तक पहुंच सकता है।”

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चित्र : ऊपर: 26/10/2023 को टाइप II का विस्फोटजिसमें मौलिक ध्वनि हार्मोनिक ध्वनि से अधिक मजबूत हैऔर नीचे: 16/7/2024 को एक विस्फोटजिसमें इसका विपरीत देखा जा सकता है।

 

आईआईए के छात्र और पहले लेखक ऋषिकेश जी. झा ने कहा, “कैलिस्टो और दुनिया भर के अन्य स्पेक्ट्रोमीटरों ने भारी मात्रा में डेटा एकत्र किया है। इस तरह का डेटा ऊपर उल्लिखित जैसी विभिन्न पहेलियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हम इस डेटा का और अधिक विश्लेषण करने के लिए मशीन लर्निंग तकनीकों को अपनाना चाहेंगे।”

 

यह शोध कार्य सोलर फिजिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इसके लेखक भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के ऋषिकेश जी. झा, के. ससिकुमार राजा, आर. रमेश और सी. कथिरवन तथा स्विट्जरलैंड के लोकार्नो स्थित इतालवी विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूटो रिसेर्चे सोलारी एल्डो ई सेले डैको (आईआरएसएल) के क्रिश्चियन मोनस्टीन हैं।

 

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