दुनिया देश

राम मंदिर के साथ राष्ट्र की प्राण प्रतिष्ठा के मोदी सरकार के गौरवशाली ऐतिहासिक कार्य से खुले भारत के विश्वशक्ति व विश्वगुरू बनने के द्वार

देवसिंह रावत-
अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान पर भव्य राममंदिर में 22 जनवरी 2024 को होने वाली प्राण प्रतिष्ठा का कार्य मोदी शासन का ऐतिहासिक महानतम कार्य है। 500 प्राचीन काल के मंदिरों से रचित होकर भारत का आत्मसम्मान स्थापित कर रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण कराया गया।
उदाहरण, सम्मान की रक्षा करने के लिए व्लामली आदि नक्षत्र और उबारने के लिए हरपाल शुभ मुहूर्त यानी श्रेष्ठ है।
मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 500 से अधिक ईसा पूर्व से ही कलंक और बहुत ही पवित्र संदेश दिया, जिस तरह से गरिमापूर्ण तरीके से शांतिमय न्यायोचित समाधान का मार्ग प्रशस्त किया और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। हर भारतीय को गर्व है। अज्ञानता छोड़ कर सच के साथ विश्वास करना ही सनातन धर्म है। यह मामला तब उठ रहा है जब हम दुसरों के योगदान और गवाही को अज्ञानता के कारण दिल से स्वीकार नहीं करते हैं।
इसके प्रथम तल के निर्माण के साथ ही 22 जनवरी 2024 को गर्भगृह में भगवान राम की बाल मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का विश्वव्यापी भव्य उत्सव मनाया जा रहा है। इस कार्यक्रम को मोदी सरकार ने इतना भव्य बनाया कि ऐसा लगता है कि त्रेता युग का प्रस्ताव हो गया। पूरे देश में पुरातात्विक महोत्सव की तरह मनाया जा रहा है। यह सारा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी, अमाध्य अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत पूरे संघ परिवार को जाता है। संघ परिवार का संकल्प व संघ स्वयंसेवकों के देश में शासन से 500 वर्ष से चल यह बहुत ही संदेश व विवाद का मामला जिस गरिमामयी, सांस्कृतिक व विधिसम्मत असंबद्धता से मोदी सरकार ने कहा कि वह बहुत ही अद्धितीय व अनुयायी होने के साथ राष्ट्र गौरव दीक्षाने वाला है मानव जाति की रक्षा करने वाला ऐतिहासिक कार्य हुआ। यह पुनर्निर्मित से निर्मित भारत की अस्मिता, आत्मसम्मान और समृद्धि के साथ स्वतंत्रता को स्थापित करने वाला बहुत ही आलौकिक कार्य है। यदि यह कार्य इस कलात्मक व सुझबुझ से नहीं किया गया तो यह देश के अमन चैन व देश की अखंडता को मजबूत करने के साथ-साथ देश की छवि को धूमिल करने का सबसे बड़ा कारण बनता है। करोड़ों लोगों के जीवन की रक्षा के साथ विश्व में भारत का यशोगान करने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ। इससे भारतीय मानस और भारतीय व्यवस्था को जहां जहां जाना जाता है वहां भारत विश्वशक्ति के साथ विश्व गुरु बनने की राह भी खत्म हो गई।
जो लोग नादानी से इस प्राण प्रतिष्ठा व इस कार्य के लिये प्रधानमंत्री मोदी पर प्रश्न चिन्ह खडा कर रहे है। वे या तो नादान है या दुराग्रही हो कर अनजाने में भारतीयता पर कुठाराघात कर रहे है। उनको भान होना चाहिये कि कलंक को मिटाने व देश का गौरव पुर्नस्थापित करने के लिये हर पल शुभ है। जो कार्य जनकल्याणार्थ किया जाता है वह शुभ होता है। जो लोग राजनैतिक द्धेष व इस विकट समस्या को समझने में असमर्थ है, वे ही मुहुर्त व आधे अधूरे मंदिर का कुतर्क दे रहे है। ऐसी समस्या को जो सत्ता के कुचक्र में शताब्दियों से उलझी हुई हो, उसके समाधान के लिये कल पर छोडना देश व मानवता पर कुठाराघात है। यह सामान्य मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा का मामला नहीं है अपितु एक शोषित, रौंदे गये देश की प्राण प्रतिष्ठा का अवसर है। देश निर्माण में लगी तमाम ताकतों को देश विरोधी तत्वों के षडयंत्र को समझना चाहिये कि आज लोकशाही के जमाने में जनादेश में ही व्यवस्था के प्राण बसते है। प्रधानमंत्री मोदी, उनके दल भाजपा व संघ से देश के लाखों लोगों का विरोध व मतभिन्नता हो सकती है। उनके उन कार्यों को विरोध किया जा सकता है। परन्तु यह राष्ट्र निर्माण का कार्य है, देश की प्राण प्रतिष्ठा का समय है, इस कार्य में लगी सरकार व प्रधानमंत्री मोदी को इस कार्य के लिये विरोध करना भारत व मानवता पर कुठाराघात है। हमारे राष्ट्र के प्राण समझे जाने वाले सनातन धर्म के शीर्ष पद पर आसीन शंकराचार्य सम्मान के योग्य हैं। उनको इस विषय की गंभीरता व संवेदनशीलता के साथ इसके दुरगामी प्रभाव को देखते हुये इस कार्य को अपना खुले मन से आशीर्वाद देना चाहिये। गौरतलब है कि  भारत विरोधी ताकतें इस महान कार्य का नाम सुनना भी पसंद नहीं करती। इसलिये भारत व मानवता के हित में इस महान कार्य में सहभागी बने । परन्तु किसी भी सूरत में देश के विरोधी ताकतों के मंसूबों में सहभागी न बने।
राम जन्मभूमि मंदिर प्रकरण का सफरनामा
मंदिर रौंदा गया 1528, 1858 में पहली बार मंदिर परिसर में हवन पूजन के लिये शिकायत दर्ज की गयी।
1858 में निहंग बाबा फकीर सिंह ने यहांं पर अपने शिष्यों के साथ पूजा अर्चना कर कारसेवा की।
यही मामला 1885 को अदालत पंहुच कर 134 साल बाद 9 नवम्बर को 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले से समापन हुआ।
1886 में इस मामले की सुनवाई कर रहे अंग्रेज जज कर्नल चैमियर ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं के आराध्य स्थल पर इस प्रकार मस्जिद बना दी गयी। पर समय बहुत हो गया।
अंग्रेजों से मुक्ति के बा 22-23 दिसम्बर की रात मूर्ति का प्रकटीकरण की खबर सुनने के बाद हजारों भक्त पूजा अर्चना करने ले।
सरकार इसे हटाना चाहती थी पर सीटी मजिस्टेट ठाकुर गुरूदत्त ने इसे हटाने से मना कर दिया। यह बात गोरखपीठाधीश्वर मंहत दिग्विजयनाथ ने सरकार की मंशा सुन कर लाखों लोगों के साथ अयोध्या को घेर दिया। उन्होने ऐलान किया कि उनके जीते जरहते मंदिर से मूर्ति नहीं हटाने देंगे। 14जनवरी 1950 के गोपाल सिंह विशारद ने इस आशय का  मामला फैजाबाद की अदालत में दज किया। यह विवाद यह रहा कि जिस जगह पर आक्रांताओं ने बाबरी मजिस्जद बनाई उस स्थान पर ही श्रीराम जन्मभूमि है। भगवान राम का मंदिर है सनातन धर्मावलबियों के लिये। रामचंद्र परंहंस दास ने भी इस आशय का मुकदमा दर्ज कराया पर 1989 में उन्होने कहा कि न्यायालय से न्याय मिलने की उनको आश नहीं है।
1959 में निर्मोही अखाड़े और 1961 में सुन्नी संतराल वक्फ बोर्ड में मामला दर्ज हुआ।
इस आंदोलन का ध्वजवाहक संघ परिवार ने रणनीति के तहत विहिप के तहत 1984 में रामजन्मभूमि मुक्ति का संकल्प लिया। इसके लिए रामजन्मभूमि यज्ञ समिति का गठन किया गया। राष्ट्रपति गोरखपीठाधीश्वर और वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु और दिगविजय नाथ के शिष्य महंत अवैधनाथ को अध्यक्ष, दाऊ लोढ़ा खन्ना के अवशेषों, महंत रामचन्द्र परमहंस दास और महंत नाट्यगोपाल दास को उपाध्यक्ष बनाया गया।
वहीं 9 नवंबर 1989 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या में राम जन्म स्थान पर श्रीराम मंदिर का निर्धारण किया था।
1 फरवरी 1986 को सिक्किम की जिला अदालत ने कांच के लॉक लॉक का आदेश दिया तो केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने अदालत के फैसले के तुरंत बाद कांच के लॉक जिले के प्रशासन को आदेश दिया। इसके बाद 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने शिला पूजन कर राम मंदिर आंदोलन को देश के हर कोने तक पहुंचाया। अयोध्या में एकत्र हुए राम भक्तों ने शिलापूजन किया और विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण की तैयारी के लिए एक आश्रम भी शुरू किया, जहां मंदिर के लिए पत्थर तोड़ने का काम 1989 से लेकर शुरू हो रहा है।
1990 में भाजपा नेता लालकृष्ण मंडल ने सोमनाथ से अयोध्या तक राममंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा निकाली। 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पंहुची रामभक्तों पर यूपी के मुख्यमंत्री महावीर सिंह यादव की सरकार ने गोली चला दी। असंख्य रामभक्तों ने बलिदान दिया।
6 दिसंबर 1992 को रामजन्मभूमि आंदोलन में राममंदिर बनाए गए विवादित ढांचे को लाखों रामभक्तों ने तोड़ दिया।
2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायलय के लंच बेंच ने सम्मेलन को तीन विचारधाराओं में बांचने का आदेश दिया। इसमें एक भाग राम जन्मभूमि का और दूसरा भाग निर्मोही कलाकारों का और तीसरा भाग सनी सेंट्रल लक्फ बोर्ड का ऑर्डर दिया गया था। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। ।। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरे परिसर को एकजुट करने का आदेश दिया। साथ ही केंद्र सरकार ने मुसलमानों को मंदिर बनाने के लिए जमीन देने का ऑर्डर दिया।
इसी स्थान पर भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है।

About the author

pyarauttarakhand5