देश

गुलाम को कांग्रेस से आजाद करने की पटकथा महिनों पहले खुद मोदी ने कर दी थी उजागर

गुलाम के त्याग दाव से स्तब्ध कांग्रेस, 
जम्मू कश्मीर में भाजपा के सपनों को साकार कर पायेंगे गुलाम या साबित होगे दूसरे अमरेंद्र

कई और सत्ता के चकोर लोकशाही का जाप कर कांग्रेस को त्याग कर बनेंगे भाजपा के खेवनहार

देवसिंह रावत

आज 26 अगस्त 2022 को वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से नाता तोड कर कांग्रेसियों को भले ही स्तब्ध कर दिया हो। परन्तु जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्य सभा में विपक्ष के नेता सहित पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे गुलाम नबी आजाद की कांग्रेस छोड़ने की पटकथा को उजागर कई माह पहले देश के प्रधानमंत्री मोदी ने खुद उजागर कर दी थी जब वे सदन में सेवानिवृत होने वाले गुलाम नबी आजाद आदि सदस्यों की विदाई का भाषण देते हुए गुलाम नबी आजाद के कसीदे पढ़ते हुए आंसू बहा रहे थे। राजनीति की जरा सी भी समझ रखने वाले राजनैतिक मर्मज्ञों ने उसी समय समझ लिया था कि अब गुलाम कांग्रेस से आजाद हो कर मोदी के जम्मू कश्मीर मिशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योद्धा होंगे। उसी दिन मेने अपने विचार अपने मित्रों व पाठकों से सांझा कर मोदी के गुलाम दाव का खुलाशा भी किया था। मोदी सहित भाजपा की राजनीति के भावी कदमों की पदचाप को पढ़ते हुए मुझे लग गया था कि गुलाम पूरी तरह मोदी के सपनों का कश्मीर बनाने के लिए दिलोे दिमाग से तैयार हैं। हाॅं इसका ऐलान जम्मू कश्मीर चुनाव की रणघोष के आसपास ही होगी। जैसे चुनाव आयोग ने जम्मू कश्मीर चुनाव के लिये अपनी व्यूह रचना का ऐलान किया उसके चंद दिनों बाद ही गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस को त्यागने का ऐलान किया। पांच दशक से अधिक समय तक कांग्रेस की सत्ता में उज्जले दिनों की चांदनी के सहभागी चकोर रहे गुलाम नबी आजाद में जरा सी भी नैतिकता होती या कांग्रेस से प्रेम होता तो वह बुरे वक्त में कांग्रेस की डुबती नौका को मझदार में नहीं छोड़ते। अपितु कांग्रेस को इस पतन के गर्त से उबारने में अपनी सेवायें प्रदान करते। परन्तु गुलाम नबी आजाद ही नहीं देश के अधिकांश राजनेता प्रायः सत्ता की चांदनी के चकोर बन कर सत्तारूढ़ दल से जुड़ते हैं। जब सत्तारूढ दल कभी सत्ता से च्युत हो जाता है तो ऐसे सत्ता की चांदनी के चकोर नेता उस दल की डूबती नौका को पार किनारा लगाने के बजाय उसको जरूरत के समय पतन के गर्त में धकेलने वाला झटका देने से भी नहीं हिचकिचाते। ऐसा नहीं कि 73 वर्षीय गुलाम नबी आजाद अकेले ऐसे नेता है। 2014 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा द्वारा कांग्रेस के सत्ता से हटा कर देश की सत्ता संभाली तबसे मोदी की सत्ता के आंधी के मोह में सेकडो कांग्रेसी दिग्गज मोदी शरण गच्छामी कर चूके है। 2019 में भी मोदी नेतृत्व वाली भाजपा की मजबूती से फिर से देश सहित राज्यों की सत्ता पर काबिज होने के बाद सत्ता के लिए कांग्रेसी बने सत्ता के चकोर भाजपा का दामन थामते रहे। उप्र सहित चार अन्य राज्यों के चुनाव में भाजपा को मिली सफलता मिलने के बाद भी सत्ता के चकोरों की हिम्मत टूटने लगी। वे अंग्रेजों के जाने के समय से आज तक गांधी नेहरू परिवार की बेसाखियों के सहारे सत्ता की चांदनी का आनंद लेने वाले चकोर अब सत्ता की ध्वजवाहिका बनी भाजपा का दामन थामने के लिए लोकशाही पर घडियाली आंसू बहाने लगे । जब उनको लगने लगा कि अब कुछ दशकों तक कांग्रेस की सत्ता में वापसी नजर नहीं आ रही है। इसी को भांप कर अब गुजरात, जम्मू कश्मीर, हिमाचल व राजस्थान आदि राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले अपनी सत्तालोलुपता पूरी करने के लिए कांग्रेस को त्याग कर झटका देने से तनिक सा भी नहीं हिचकिचाये। इन राज्यों से संबंध रखने वाले नेताओं के अलावा केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों के ऐसे सत्ता के लिए तरस रहे नेता देर सबेर कांग्रेस पर लोकशाही का टिकरा फोड कर या भाजपा का दामन थामेंगे या अमरेन्द्र सिंह की तरह अगल दल बना कर भाजपा का सहयोगी बनकर भाजपा के सत्ता का परचम लहराने वाले बनेंगे। जो लोग कांग्रेस में रह कर भारतीय संस्कृति व भारतीय आराध्यों का उपेक्षा व अपमान कर रहे हैं वे अपरोक्ष रूप से कांग्रेस को पतन के गर्त में धकेलकर भाजपा का परचम लहराने का काम करने वाले ही हैं। राहुल गांधी को 2014 के पराजय के बाद गठित एंथनी कमेटी की सलाह पर गंभीरता से मनन करके बिना कारण भारतीय संस्कृति पर निशाना लगाने वाले बयानों पर विराम लगाना होगा।
भले ही कुछ लोग यह समझ रहे हैं कि गुलाम नबी आजाद की उपेक्षा हो रही थी कांग्रेस में। सच तो यह है गुलाम नबी को कांग्रेस जम्मू कश्मीर के लिए  मुख्यमंत्री का भी दावेदार घोषित करते तो गुलाम नबी आजाद फिर भी कांग्रेस को किसी न किसी बहाना करके त्यागते। क्योंकि गुलाम को मालुम है कि भाजपा के साथ रहे कर वह जम्मू कश्मीर को मुख्यमंत्री बन सकते हैं । अगर किसी कारण जम्मू कश्मीर में चुनाव में सफल नहीं हुये तो वह केंद्र सरकार में मोदी के प्रताप से हो ही जायेंगे। गुलाम नबी को इस बात का भान है कि मोदी शाह जम्मू कश्मीर में जितना भी राजनैतिक चक्रव्यूह की रचना कर रहे हैं वह किसी महबूबा या उमर या कांग्रेसी को सत्ता का ताज पहनाने के लिए नहीं कर रहे हैं। वे भाजपा का परचम जम्मू कश्मीर में लहराने के लिए तमाम कार्य कर रहे है। भाजपा की कमजोरी यह है कि जम्मू कश्मीर में उनके पास कोई बडा चेहरा नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने गुलाम नबी को कांग्रेस से आजाद कराने का पाशा चला। गुलाम नबी भले ही घाटी में लोकप्रिय चेहरा ना भी हों परन्तु जितने अन्य चेहरे हैं उनसे अधिक विख्यात हैं और देश के लिए समर्पित नेता है। वह शायद भारत के  ऐसे बडे नेता होंगे जो पाकिस्तान नहीं गये। नहीं तो कश्मीर का अधिकांश छोटे बडे नेता का पाकिस्तान  प्रेम जग जाहिर है। गुलाम नबी आजाद जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री थे उन्होने देश में पहली बार देश के दूरस्थ व ग्रामीण क्षेत्रों में एमबीबीएस चिकित्सकों के न जाने से उत्पन्न हुई विकट समस्या के स्थाई समाधान का हल निकाल दिया था। परन्तु उनके भारत के ग्रामीण व दूूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के समाधान करने वाला जिला चिकित्सक प्रशिक्षण को देश की स्वास्थ्य माफियाओं ने अपने प्रभाव व दवाब में लागू की नहीं होने दी। देखना यह है कि गुलाम नबी आजाद अब जम्मू कश्मीर में भाजपा के सत्ता पर काबिज होने के सपनों को साकार करने में कितने साहयक होते हैै या जम्मू कश्मीर के अमरेंद्र सिंह साबित होते। रही बात कांग्रेस की अगर राहुल गांधी अपना पलायनवादी व अंध तुष्टिकरण का रूख त्याग कर देशहितों ंके उदघोष करते हुए कांग्रेस का नेतृत्व करें तो इन तमाम सत्ता के चकोंरों का कांग्रेस को त्याग करना कांग्रेस के लिए बरदान ही साबित होगा।

About the author

pyarauttarakhand5