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हिमालयी क्षेत्र में बांध बनाना ही है खतरनाक! -यही है तपोवन चमोली में ग्लेशियर टूटने से मची तबाही का साफ संदेश

उत्तराखंड में हिमखण्ड त्रासदी से ऊर्जा संयंत्र सहित सवा दो सौ से ज्यादा लोगो हुए शिकार

तपोवन चमोली से प्यारा उतराखण्ड डाट काम

7 फरवरी को तपोवन में रैणी गांव क्षेत्र में विशाल हिमखण्ड के टूटने से मची तबाही से भारत ही नहीं पूरा विश्व स्तब्ध है। इस तबाही से जहां ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट आदि पूरी तरह से तबाह हो गये है और इस तबाही से करीब सवा दो सो लोग इसके शिकार हो गये। चार दिन से चल रहे बचाव व राहत अभियान के बाद जहां कई लोगों को बचाया गया। करीब 32 लोगों के शव बरामद हो गये है और करीब दो सौ के करीब लोग लापता है।

वहीं इस तबाही से एक बात साफ हो गयी कि हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार की तमाम परियोजनायें बेहद खतरनाक हैं। अग्रणी समाजसेवी देवसिंह रावत ने देश व उतराखण्ड सरकारों से आग्रह किया कि हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार की तमाम गतिविधियों पर त्वरित रोक लगायी जाय। उल्लेखनीय है कि अभी प्राप्त सूचनाओं के अनुसार जहां से हिमखण्ड टूटा इस प्रकार की आशंका लगातार बनी हुई है। हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार हिमखण्ड का टूटना कोई अनहोनी नहीं है। इसलिए सरकार को चाहिए इस प्रकार के संवेदनशील स्थानों में इस प्रकार के बांध आदि ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण करना इस प्रकार की त्रासदी को एक प्रकार की निमंत्रण देना है। इन क्षेत्रों में स्थानीय ग्रामीणों के अलावा अन्य किसी किसी प्रकार की गतिविधियों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना चाहिए। यह हिमखण्ड संयोग से उतनी भारी त्रासदी नहीं मचा पाया। अगर इससे बड़ी ऐसी त्रासदी हुई तो उतराखण्ड स्थित गंगा के तटवर्ती शहरों के अलावा उप्र आदि प्रदेश के गंगा के तटवर्ती शहरों में भारी त्रासदी मच सकती है। इस प्रकार की आशंका को सिरे से निर्मूल करने का दायित्व भी सरकार का ही है। इसलिए हिमालयी क्षेत्रों में जो पहले से भूकंपीय दृष्टि से भी संवेदनशील क्षेत्र है वहां पर बांध आदि पर्यावरण को रौंदने वाले निर्माण करना विनाशकारी कदम है। 

इस प्रकरण पर अपना शोक संदेश देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने साफ किया कि वह हमेशा हिमालयी क्षेत्र में गंगा व उसकी सहायक नदियों में बांध बनाये जाने के खिलाफ रही। यानी एक मंत्री के विरोध के बाबजूद उनकी सरकार ऐसे बांध क्यों बना रही है। जो जनहित व राष्ट्रहित के लिए काफी नुकसान दायक रहते है। अग्रणी समाजसेवी देवसिंह रावत ने इस त्रासदी के लिए देश की व्यवस्था में काबिज वो लोग हैं जो जनता के विरोध व पर्यावरण के मानकों का खुला उलंघन करके दो टके के लिए हिमालयी क्षेत्रों में बांध बनाने की इजाजत देते हैं। इससे देश को भारी नुकसान उठाना पडता है। श्री रावत ने कहा कि सरकार को तपोवन में हुई हिमखण्ड त्रासदी से सबक लेकर हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार के बांध बनाने के अपने निर्णय पर पुर्नविचार करके इसे देशहित में इन्हें रोक दें।
गौरतलब है कि ऋषिगंगा घाटी के हिमालयी पर्वतीय श्रृंखला में हुए भारी हिमपात के बाद हिमखण्ड के टूटने से ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में अचानक जो भारी तबाही हुई उससे 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा जल विद्युत परियोजना पूरी तरह तबाह हो गयी तथात 520 मेगावाट तपोवन-विष्णुगाड परियोजना की सुरंग में काम कर रहे लोग उसमें फंस गए थे। इसके बाद उतराखण्ड में आयी इस त्रासदीसे उबारने के लिए उतराखण्ड सरकार की सहायता के लिए केंद्र सरकार ने सेना, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल , भारत तिब्बत सीमा पुलिस और उतराखण्ड आपदा प्रबंधन बल ने युद्धस्तर पर बचाव और तलाश अभियान छेडा हुआ है। मलवा में फंसे कई लोगों को राहत दल ने बचा लिया। सबसे बडा बचाव अभियान सुरंग में फंसे दो दर्जन से अधिक लोगों को बचाने के लिए विगत 4 दिनों से निरंतर छेडा हुआ है। इसमें नौसेना के जांबाज सहित इस प्रकार की आपदा से निपटने में महारथ हासिल बल लगाये गये। परन्तु लम्बी सुरंग में भारी मलवा व पानी भरे होने के कारण अभी इस अभियान में सफलता नहीं मिली। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने तुरंत राहत व बचाव कार्य में तेजी लाने के लिए दुर्घटना स्थल व बचाव स्थल में गये। जिस प्रकार से उतराखण्ड सहित देश के लोगों के दिलों में 2013 में केदारनाथ त्रासदी के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा एक माह तक दुर्घटनास्थल न जाने के कारण बेहद आहत थे। लोग आशंकित थे कि कहीं वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी कहीं विजय बहुगुणा के पद चिन्हों पर तो नहीं चले। परन्तु त्रिवेंद्र सरकार व केंद्र सरकार ने बेहतर तालमेल बना कर पीड़ितों को उबारने के लिए युद्धस्तर पर बचाव व राहत अभियान छेडे हुए हैं।

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