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चीन के खिलाफ बर्चस्व की जंग लड रहे अमेरिका के लिए ही आत्मघाती साबित होगी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट

भारत से अमेरिकी मित्रता के मुखौटे को खुद अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने किया बेनकाब

 
मोदी सरकार द्वारा धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के कार्यो से आक्रोशित है अमेरिकी सहित सभी कटरपंथी संस्थायें  

एक तरफ अमेरिका चीन के खिलाफ कोरोना महामारी में भी बर्चस्व की जंग छेडे हुए है। जब अमेरिका इस चीनी महामारी के दंश से अपने वजूद की इस जंग में भारत ने एक मित्र के रूप में अमेरिका का मजबूती से साथ दिया। इस जंग में अमेरिका को  भारत जैसे मजबूत देश के समर्थन की नितांत आवश्यकता है। ऐसे संकट के समय में भी अमेरिकी सरकार की एक संस्था द्वारा अपने एक मजबूत मित्र को बेवजह कटघरे में खड़ा करने की भूल अमेरिका के लिए जहां आत्मघाती भूल साबित होगी वहीं इस कदम ने अमेरिका का दोस्ती का मुखौटा खुद ही बेनकाब कर दिया।
भारत सरकार ने भी अमेरिकी संस्था के  अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आजादी के नाम पर रखी गयी तथाकथित रिपोर्ट को सिरे से नकारते हुए आयोग पर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने का आरोप लगाया। भारत ने कहा कि भारत को आईना दिखाने का इस आयोग के पास कोई अधिकार ही नहीं  है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि हम अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में भारत के खिलाफ टिप्पणियों को खारिज करते हैं। भारत के खिलाफ उसके ये पूर्वाग्रह वाले और पक्षपातपूर्ण बयान नए नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने 28 अप्रैल को जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2020 में भारत को अल्पसंख्यकों के हितों पर कुठाराघात करने का गुनाहगार बताते हुए ट्रंप प्रशासन के विदेश विभाग से भारत समेत 14 देशों को खास चिंता वाले देशों  के रूप में नामित करने की पुरजोर अनुशंसा की हैं। इस आयोग ने आरोप लगाया कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की दशा में बड़ी गिरावट आयी एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हो गये। इसका आधार सन् 2019 की नागरिकता संशोधन कानून और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा के मामलों का हवाला दिया।अमेरिका के इस 9 सदस्यीय आयोग में 6 सदस्यों ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता हनन करने वाले खास चिंता वाले देशों में रखने की यह सिफारिश की । इस आयोग के सदस्य दो सदस्यों गैरी एल बाउर व  तेंजिन दोरजी अपनी असहमति प्रकट करते हुए दो टूक शब्दों में विरोध प्रकट किया कि भारत को चीन व उतरी कोरिया जैसे देशों के जमात में नहीं रखा जा सकता।  तीसरे सदस्य ने भी भारत पर अपनी निजी राय रखी है।

सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस अमेरिका के खुद के हाथ रेड इंडियनों, रंगभेद सहित विश्व के असंख्य लोकशाही के ध्वजवाहकों के खून से सने हो वे सबके कल्याण के लिए समर्पित भारत को मानवधर्म का पाठ पढ़ाने की धृष्ठता करे तो इससे बड़ी धृष्ठता कोई दूसरी हो ही नहीं सकती।अमेरिका खुद  तो मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता व लोकशाही का  शिकारी है ।हालांकि भारत ने आतंकी पाकिस्तान को संरक्षण देने, कश्मीर, पंजाब, पूर्वोतर आदि आतंक के मामले के साथ मुम्बई आतंकी हमले में अमेरिका की खलनायकी भूमिका को भी नजरांदाज करके दोस्ती की नई इबादत लिखने की पहल की। परन्तु इस आयोग के नापाक मंशा से लगता है अमेरिका को दोस्त की नहीं अपितु  पाकिस्तान जैसे विश्वासघाती प्यादे ही पसंद है।
अमेरिका द्वारा भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में कटघरे रखने पर मोदी सरकार के घोर विरोधी नेता इसे मोदी व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती की सौगात बता कर तंज कस रहे हैं।
वैश्विक व अमेरिका मामलों के विशेषज्ञों ने इस प्रकरण पर दो टूक शब्दों में कहा कि यह कोई हैरानी की बात नहीं है। अमेरिका संसार में न मित्रता मानता है व नहीं मानवता। उसका विश्वास किसी धार्मिक स्वतंत्रता व लोकशाही पर नहीं अपितु वह केवल अपना स्वार्थ देखता है। वह किसी भी देश की संप्रभुसता को भी स्वीकार नहीं करता है। विश्व में अमेरिकी सम्राज्यवाद का शिकंजा कसने व अमेरिकी हितों की रक्षा करने के  लिए अमेरिका मानवाधिकार,नस्ल-रंग भेद के अलावा धार्मिक स्वतंत्रता रूपि अस्त्रों से सदैव दूसरे देशों को कटघरे में रख कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हुए मानवाधिकार, लोकशाही, धार्मिक, नस्ल-रंगभेद आदि शोषण के खिलाफ एकमात्र स्वयंभू वैश्विक पुरोधा सात दशकों से  बना हुआ है।अमेरिका अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग दिसंबर, 2019 में खास चिंता वाले देशों में  म्यांमार, चीन, एरिट्रिया, ईरान, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, तजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे 9 देशों को नामित कर चूका है। इन 9 देशों के अलावा  अमेरिका ने भारत सहित 5 अन्य देशों   नाईजीरिया, रूस, सीरिया और वियतनाम को भी इसी सूचि में नामित करने की अनुशंसा की है। ं
विशेषज्ञों  ने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह है कि वर्तमान विश्व में मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, लोकशाही  के हनन का कोई सबसे बडे गुनाहगारों में अमेरिका का नाम सबसे उपर है।जिसका इतिहास ही रंगभेद व नस्लभेद की हैवानियत से भरा पडा है।
सबसे हैरानी की बात है खुद अमेरिका, हिरोशिमा व नागासाकी के अलावा वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक, मिश्र, सीरिया, लीबिया आदि अनैक देशों की धरती यहां के धरतीपुत्रों के रक्त से रक्तरंजित करने के लिए कुख्यात है। संसार में वर्तमान में छह दर्जन से अधिक देशों में उसके सैन्य हस्तक्षेप है। अपनी सम्राज्यवादी कलुषित मंसूबों के लिए उसने पूरे विश्व को अपनी छावनी बना रखा है। दुनिया भर में लोकशाही के दुश्मन तानाशाहों व आतंकी संगठनों के साथ  पाकिस्तान जैसी आतंकी देश को कहीं न कहीं अमेरिका का संरक्षण जगजाहिर है। अमेरिका को लोकशाही, मानवाधिकार व धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर केवल अपने स्वार्थ ही दिखते है। जहां तक भारत का संबंध है अमेरिका की सबसे ताकतवर व असरदार तबहा  नहीं चाहता है कि भारत में धर्मांतरण के मार्ग में कोई भी अवरोध खडा करे। क्योंकि अमेरिका में सबसे प्रभावशाली ईसाई संस्थायें है। ये संस्थायें भी अरब द्वारा पोषित इस्लामी संस्थाओं की तरह भारत सहित एशिया व अफ्रीका में बड़ी ताकत से धर्मांतरण करके अपना विस्तार करने में लगी है। ये संस्थायें नहीं चाहती कि उनके मार्ग में इन देशों की सरकारें किसी प्रकार का अवरोध  खडे करे। ये संस्थायें गरीब, वनवासी व पिछडे क्षेत्रों में जनसेवा के नाम पर अपना शिकार करते है। भारत सरकार के नागरिकता कानून,तीन तलाक व कश्मीर समस्या के समाधान आदि कदम उठाने से इन शिकारियों को लगा कि भारत में अब उनके कलुषित मंसूबों पर ग्रहण लग सकता है। जैसे भारत में अपनी भाषा, अपनी संस्कृति व अपने उद्यमों को वरियता देने की बात सामने आने लगी तो इनको अपनी लंका ढहने की आशंका होने लगी। ऐसी स्थिति में इन्होने भारत के खिलाफ जम कर विष वमन करना शुरू कर दिया। इनके कलुषित मंसूबों को भारत में इनके प्यादे आस्तीन के सांपों की भांति भारत में मानवाधिकार, धार्मिक हिंसा व लोकशाही के नाम पर विधवा विलाप करने लगे है। इस आयोग की रिपोर्ट को बह्मास्त्र समझ कर ये लहरा रहे है। परन्तु देश का जागरूक जनता जानती है कि जो अपने कुलषित मंसूबों के लिए देश की भोली भाली जनता को गुमराह कर पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या करने का कुकृत्य कर सकते है। उनके इन इरादों को निर्ममा से कुचलने की जरूरत है।
अमेरिका के इस आयोग की धृष्ठता पर सच ही कहा गया कि
या खुदा कैसा जमाना आ गया
कातिल खुद फैसला सुनाने आ गया
जिनके हाथ रेड इंडियनों, रंगभेद सहित विश्व के असंख्य लोकशाही के ध्वजवाहकों के खून से सने हो वे सबके कल्याण के लिए समर्पित भारत को मानवधर्म का पाठ पढ़ाने की धृष्ठता कर रहे है। ये तो शिकारी है धर्मांतरण कर राष्ट्रांतरण के गुनाहगार। इनको मानवता के ध्वजवाहकों को धार्मिक आईना दिखाने का दुशाहस आत्मघाती ही साबित होगा।

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