उत्तराखंड

गैरसैंण में राजधानी बनने से ही उतरेगा उतराखण्ड को बर्बाद कर रहा नेताओं व नौकरशाहों के सर पर चढ़ा पंचतारा लखनवी भूत

गैरसैंण मात्र स्थान नहीं अपितु उतराखण्ड की लोकशाही, चहुमुखी विकास व देश सुरक्षा का प्रतीक है

गैरसैंण को नापसंद करने वाले नेताओं व नौकरशाहों की जरूरत एक पल के लिए भी नहीं है उतराखण्डियों को

देवसिंह रावत

लोकशाही में दल, व्यक्ति व स्थान नहीं अपितु जनभावनाएं ही सर्वोपरि होती है। राज्य गठन जनांदोलन के प्रारम्भिक चरण में ही न केवल राज्य गठन की ताकतों ने अपित तत्कालीन उप्र सरकार ने भी उतराखण्ड की राजधानी के लिए सभी पहलुओं की दृष्टि से गैरसैंण पर अपनी सहमति  प्रदान की थी। इसकी मांग राज्य गठन से पूर्व से लेकर राज्य गठन के 18 सालों तक निरंतर चल रही है।   इसलिए राज्य गठन के बाद प्रदेश की सरकारों का संवैधानिक व नैतिक दायित्व था जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तत्काल प्रदेश की राजधानी गठित करते। अपने निहित स्वार्थ व दलगत बंधुआ मजदूरी से उपर उठ कर सोच समझे वाले हर समर्पित उतराखण्डी चाहता है कि प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बने। गैरसैंण उतराखण्डियों के लिए मात्र एक स्थान नहीं अपितु लोकशाही का प्रतीक है। राज्य गठन आंदोलन के संघर्ष व बलिदानों का प्रतीक है। प्रदेश के चहुमुखी विकास का प्रतीक है। प्रदेश के स्वाभिमान व हक हकूकों का प्रतीक भी है। देश की सुरक्षा का प्रतीक है। प्रदेश की एकमात्र विधानसभा का निर्माण ही गैरसैंण में हुआ है। जो देश की सबसे रमणीक राजधानियों में एक है। गैरसैंण विधानसभा में न केवल ग्रीष्मकालीन सत्र अपितु शीतकालीन व बजट सत्र भी आयोजित हो चूके है। यहां पर विधायक, कर्मचारी व अन्य महत्वपूर्ण निवास भी निर्माणाधीन है। यहां पर राजधानी के लिए जरूरी अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों व प्रदेश के हर जनपद को गैरसैंण से जोड़ने वाली सडकें निर्माणाधीन है।
गैरसैंण से ही उतराखण्ड को (पर्वतीय जनपदों की समस्याओं व जनभावनाओं को ं) समझ पायेंगे नेता नौकरशाह। गैरसैंण पंचतारा का भूतचढे नेता व नौकरशाहों के लिए लोकशाही की प्राथमिक पाठशाला है। गैरसैंण राजधानी बनने से प्रदेश के दूरस्थ व पर्वतीय जनपदों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व शासन का स्तर में सुधार होगा। सडकों सहित परिवहन की तमाम विकल्प का विस्तार होगा। हिमाचल की तरह पर्वतीय जनपदों से पलायन रूकेगा और विकास की गंगा बहेगी।
गैरसैंण में राजधानी बनने से ही उतरेगा उतराखण्ड को बर्बाद कर रहा नेताओं व नौकरशाहों के सर पर चढ़ा पंचतारा लखनवी भूत। प्रदेश गठन के समय नये उतराखण्ड राज्य के  सभी नेता व नौकरशाहों के दिलो दिमाग में लखनवीं पंचतारा संस्कृति में ही रमा हुआ था। उनको उतराखण्ड में केवल देहरादून में ही लखनऊ का एकांश नजर आया। इसी कारण उन्होने प्रदेश की राजधानी गैरसैंण घोषित करने के बजाय जनता को धोखा देते हुए गुपचुप तमाम कार्यालय देहरादून में निर्माण कर दिये। इन्होने देहरादून में अपने लिए लखनऊ की तरह पंचतारा सुविधाओं को जुटाया। अब इनको गैरसैंण का नाम सुनते ही मौत सी नजर आती है। इन्हें प्रदेश की जनांकांक्षाओं, विकास व देश की सुरक्षा से कुछ भी लेना देना नहीं। पर उतराखण्ड के समर्पित आंदोलनकारियों ने निरंतर इस मांग को गूंजाये रखा। जिसके दवाब में ही ये देहरादून को प्रदेश की राजधानी चाह कर भी घोषित नहीं कर पाये । इसी जनदवाब के कारण गैरसैंण में विधानसभा का गठन करने को ये मजबूर हुए और इसी दवाब में न चाहते हुए भी प्रदेश की सरकारें गैरसैंण में मंत्रीमण्डल की बैठक, ग्रीष्मकालीन, शीतकालीन व बजट सत्र कराने के लिए मजबूर हुए। अब तक देहरादून के मोह में ये गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का बेसुरा राग छेडते रहे परन्तु प्रदेश के प्रबुद्ध समर्पित लोगों ने इनको दुत्कारा तो ये अब गैरसैंण में राजधानी का राग छेडने लगे। परन्तु घोषित करने का नैतिक साहस तक नहीं जुटा पा रहे है। गैरसैंण का विरोध करने वाले नेताओं को उतराखण्डी, मुलायम से बदतर मान कर धिक्कार  रहे है। भाजपा की वर्तमान सरकार के गैरसैंण विरोधी रवैये से नाखुश उतराखण्डी जनभावनाओं को भांप कर भाजपा के आला नेतृत्व  से डपट खाने के बाद  ही ग्रीष्म कालीन सत्र न कराने वाले मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत को शीतकालीन व बजट सत्र भी गैरसैंण में आयोजित करना पडा। यही नहीं गैरसैंण राजधानी की मांग को सिरे से नकारने के लिए कुख्यात प्रदेश भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष अजय भट्ट भी नैनीताल से सांसद बनने के बाद लोकसभा में चोखुटिया रेल की मांग करते समय प्रदेश की राजधानी गैरसैंण में बनने की बात कहने के लिए मजबूर हुए। इसी जनभावनाओं को भांप कर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत गैरसैंण के लिए गिरफ्तारी देने की हुंकार भरते नजर आये। इसी जनभावनाओं को भांप कर भाजपा के हरिद्वार के विधायक व दिग्गज नेता मदन कोशिक गैरसैंण सत्र में कांग्रेसी सरकार के समय स्थाई राजधानी गैरसैण बनाने के लिए पुरजोर मांग कर बैठे। यही नहीं वर्तमान विधानसभाध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल, जो रिषिकेश के विधायक है ने राजधानी गैरसैंण बनाने का पुरजोर समर्थन किया। हां प्रदेश में गैरसैंण राजधानी बनाने के लिए एक ही नेता पूर्ण रूप से राजनीति से उपर उठ कर पूर्ण समर्थक है वह है राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा। हालांकि सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा भी इसके पक्षधर रहे पर राजधानी बनाने के मामले में प्रदीप टम्टा की तरह पूर्ण समर्पित नहीं है। वहीं हरीश रावत के शासनकाल में जिस मुखरता से विधानसभाध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल, उप विधानसभाध्यक्ष मैखुरी आदि भी समर्पित रहे। अब कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत के पूर्ण रूप से गैरसैंण के समर्थन में कूदने से प्रदेश  की राजनीति में भारी परिवर्तन इस मामले में होगा। इससे कांग्रेस में गैरसैंण के विरोधी इंदिरा हृदेश आदि के भी सुर बदलेगे। वहीं भाजपा को भी अपने सुर बदलने पडेंगे।
कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए जनभावनाओं, प्रदेश व देश के हितों को रौंदते है। जिस लखनवी मनोवृति से उबरने के लिए उतराखण्डियों ने जिस पर्वतीय राज्य ‘उतराखण्ड’ की कल्पना  को साकार करने के लिए उतराखण्डियों ने राव व मुलायम के अमानवीय अत्याचारों को शह कर भी साकार किया था। उस राज्य के गठन होने के बाबजूद जनभावनायें साकार नहीं हो पायी। इसका मूल कारण लखनऊ की तरह देहरादून की पंचतारा सुविधाओं में आसीन प्रदेश के नेताओं व नौकरशाहों के लिए कालापानी ही नजर आने लगा। इसी कारण प्रदेश के अधिकांश नेता, नौकरशाह,समृद्ध लोग देहरादून व उसके आसपास के मैदानी जनपदों में कुण्डली मार के बैठ गये। इससे प्रदेश के उन पर्वतीय जनपदों जिन्होने पृथक उतराखण्ड राज के लिए संघर्ष किया था,वे शिक्षक, चिकित्सक,रोजगार, शासन से उपेक्षित होने लगे, इससे प्रदेश में विनाशकारी पलायन हो गया। जिससे इस सीमांत प्रदेश के सीमांत गांव उजडने लगे। इससे न केवल प्रदेश स्थिति विकराल हो गयी अपितु देश की सुरक्षा भी खतरे में पड गयी। राजधानी गैरसैंण बनने से उतराखण्ड के उन सीमान्त व पर्वतीय जनपदों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व शासन का स्तर में आमूल सुधार होगा। उतराखण्ड नेताओं व नौकरशाहों को एक बात ध्यान में रखना होगा कि उतराखण्डी लोगों ने पृथक राज्य के गठन के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किसी नेताओं व नौकरशाहों के ऐशोआराम के लिए नहीं किया था अपितु उतराखण्ड की दशा व दिशा सुधारने के लिए किया था। इसी के लिए बाबा मोहन उतराखण्डी व देवसिंह नेगी सहित अनैक शहीदों ने अपनी शहादतें दी। जिन नेताओं व नौकरशाहों को पंचतारा सुविधाओं के मोह में उतराखण्ड की लोकशाही के प्रतीक गैरसैंण पंसद नहीं है उनकी जरूरत एक पल के लिए भी उतराखण्ड को नहीं है।

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