उत्तराखंड देश

शहरी कानून थोप कर प्रकृति की गोद में जीने वाले हिमालयी लोगों दुनिया न उजाडे़!

उच्च न्यायालय के फरमान के बाद जागा कुम्भकर्णी प्रशासन

राजाजी राष्ट्रीय पार्क के गौहरी रेंज में रहे रहे वन गूजरों ने प्रशासन से की विस्थापन की मांग

देवसिंह रावत

दशको से वनो में प्रकृति की गोद में अपना जीवन बसर करने वाले वन गूजरों सहित वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के हक हकूकों पर अपनी शहरी मापदण्डों को थोप कर यहां के रहने वालों का जीना दूश्वार करती है। उत्तराखण्ड में एक ऐसा फरमान देखने में आया। पहला नजारा उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के आदेश पर राजाजी राष्ट्रीय पार्क के गौहरी रेंज में रह रहे 30 वन गुजर परिवारों को हटाने का फरमान। इस पर प्रशासन का अमानवीय नजरिया। दूसरा प्रदेश की जनभावनाओं को साकार करने लिए गैरसैंण में बनने वाली राजधानी पर पर्यावरण के नाम पर उठ रहे सवाल।
सवाल यह है कि क्या देश का शासन व्यवस्था के ध्वजवाहक प्रकृति की गौद में जीवन जी रहे लोगों पर अपनी शहरी मापदण्ड थोप कर उनकी दुनिया पर क्यों ग्रहण लगाती है।  इन सवालों ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न को हवा दे दी कि बिना उचित विस्थापन किये किसी नागरिक को उसकी जमीन व निवास से हटाना अमानवीय है। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट के आदेश के वाद राजाजी राष्ट्रीय पार्क के गौहरी रेंज में  अवैध रूप से रहने वाले 30 वन गूजर परिवारों के खिलाफ कार्रवाई की गयी।
कभी विकास के नाम पर बांध बना कर सैकड़ों गांवों व घाटियों को करोड़ों अरबों जीवों को जबरन जल समाधी दी जाती है। कभी अपने मनोरंजन के लिए अभ्यारण व पार्क आदि योजनायें बना कर यहां के लोगों की दुनिया को उजाड़ा जाता है। इनको उजाड़ने का तरीका इतना अमानवीय व अन्यायपूर्ण होता है कि जबरन विस्थापित किये जा रहे लोगों को उनको वही समान परिवेश देने के बजाय अनुपयुक्त परिवेश में फेंक दिया जाता है। अधिकांश लोगों को विस्थापन तक नहीं किया जाता। उनके विस्थापन के संसाधनों की बंदरबांट करने के लिए तंत्र इतने संवेदनहीन ढ़ंग से काम करता है कि लोगों की जिंदगी ही दुस्वार हो जाती है। परन्तु जब वनांचलों की जनता के विकास के लिए मोटर मार्ग, पेयजल नहर, आदि बनाये जाने की होती है तो वहां पर वन कानूनों का हंटर चलाया जाता है। सबसे हैरानी वाला फरमान उत्तराखण्ड की गैरसैंण में जनभावनाओं के आदर के लिए बनायी जा रही विधानसभा आदि के निर्माण पर पर्यावरण की लक्ष्मण रेखायें खिंचने जैसे अन्यायपूर्ण व पक्षपातपूर्ण सवाल उठाये जा रहे है।
वन गुजरों ने उनको हटाने के लिए रेंजर राजेन्द्र नौटियाल के नेतृत्व में आये दल क्षेत्र में घुसने का विरोध किया। वन गूजर रेंजर की गाड़ी के आगे लेट गये। पुलिस प्रशासन के आने के बाद वन गूजरों ने पार्क प्रशासन की गाड़ियों को जाने दिया। वन गूजरों का कहना है कि पार्क प्रशासन बिना विस्थापित किये उन्हें वन क्षेत्र खाली करने के आदेश दे रहा है। जबकि उन्हें अभी तक जमीन भी नहीं मिली है। ऐसे में वह अपने जानवरों व बच्चों के साथ कहां जायें। पार्क प्रशासन को पहले वन गूजरों का विस्थापन करना चाहिए। गौहरी रेंज में वर्तमान में करीब 30 परिवार निवास करते हैं। जिन्हे अभी तक जमीन नहीं मिली है। जबकि पार्क प्रशासन उनका सत्यापन तक कर चुका है। गूजरों का कहना है कि पार्क प्रशासन पहले उन्हे जमीन दे उसके बाद बन क्षेत्र को खाली किया जायेगा।
दूसरी तरफ रेंजर राजेन्द्र नौटियाल ने बताया कि गौहरी रेंज में रहने वाले वन गूजरों को सरकार द्वारा गैंडीखाता हरिद्वार में भूमि दी जा चुकी है। इसके बावजूद कई वन गूजर पार्क के भीतर अवैध रूप से निवास कर रहे हैं। पूर्व में भी वन गूजरों से पार्क क्षेत्र खाली करने की अपील की जा चुकी है, लेकिन वन गूजर जाने को राजी नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश के वाद पार्क के भीतर अवैध रूप से रहने वाले वन गूजरों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
सवाल केवल वन गूजरों का नही है।

टिहरी बांध हो या अन्य, सभी जगह शासन प्रशासन का नजरिया पीड़ित लोगों के हितों व उनके प्रकृति के साथ तारतम्यता को पूरी तरह नजरांदाज करके उनको भी शहरी मापदण्डों को थोप पर उनकी जिंदगी पर ग्रहण लगाने का कृत्य किया जाता है। तथाकथित विकास का नजरिया थोपने वाले भूल जाते हैं जो लोग  शताब्दियों से प्रकृति के साथ जीते है, उसकी रक्षा करते है और प्रकृति उनके रग रग में बसी होती है। उससे बलात दूर करके उनका जीवन मृतप्राय बना दिया जाता है। अगर यही प्रकृति की गोद में जीने के मापदण्ड शहरों में थोप दिया जाय तो शहरी जीवन पटरी से पूरी तरह से उतर जायेगा। इसलिए प्रकृति द्वारा खिंची लक्ष्मण रेखाओं को नजरांदाज करना हित में नहीं है।  व्यवस्था को चाहिए कि वह अपने शहरी क्षेत्रों में वनों व वन जीवों को उजाड़ने का प्रायश्चित के रूप में शहरों के बीचों बीच वन और अभ्यारण बनाये जाये।

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