अध्यात्म दुनिया

ग्रहण एक अंध विश्वास नहीं अपितु खगोलीय विलक्षण घटना होती है

सूर्य पर लगे आंशिक ग्रहण के अवसर पर प्रकृति ने रिमझिम बारिश से नहालाई दिल्ली

आधुनिक विज्ञान से हजारों साल पहले सूर्य ग्रहण का गहन ज्ञान था भारतीय मनीषियों को

आधुनिक विज्ञान को अभी पृथ्वी व अपने सौर परिवार का भी पूरा ज्ञान नहीं। विराट ब्रह्माण्ड का से आज भी है अनविज्ञ

देवसिंह रावत
ग्रहण का नाम सुनते ही दुनिया का हर इंसान आशंकित हो जाता है। चाहे यह ग्रहण सूर्य पर लगे या चंद्र पर या खुद पर। हालांकि आज लोकशाही के जमाने में लोग जान गये कि ग्रहण जो देश व दुनिया पर लगते है वह कहीं अधिक खतरनाक होती है। पर सच यह है कि आम आदमी खुद पर लगे ग्रहण से अधिक भयभीत होता है। ग्रहण को आम आदमी बुरा समय के रूप में जानता है। जब किसी व्यक्ति, संस्था, क्षेत्र, प्रदेश, देश व दुनिया का बुरा समय आता है तो लोग इसे ग्रहण लगना मानते है। यह जिस पर लगता है उस पर ग्रहण लगा मानते है। इंसानों के इसी भय का दोहन करते हैं कालनेमी जिन्हें ढौंगी के रूप में जाना जाता है। यह ज्योतिषि, पण्डित, मौलवी, फादर आदि के नाम से आशंकित लोगों से ग्रहण को दूर करने के ठेकेदार बनकर जमकर लूटते है।
पर यह भी सच है ग्रहण होता अशुभ ही यानी खतरे की घंटी। भले ही अज्ञानी लोग इसे अंध विश्वास कहें। पर हम इन अज्ञानियों की कबुतरी प्रवृति को नजरांदाज करके इनके कुप्रभाव से बचने का उपाय करने चाहिए। अब हम आज के सूर्य ग्रहण की ही बात करे। खगोलीय नजरिये से दो प्रकार के ग्रहण इस दुनिया में विख्यात है। एक सूर्य ग्रहण व  एक चंद्र ग्रहण।

आज 6 जनवरी को  जिस समय पूरी दुनिया के खगोलीय वैज्ञानिक, प्रकृति की सबसे रहस्यमय व अदभूत घटना के एक एक पल का  दर्शन कर अपना ज्ञान बर्धन कर रहे थे । क्योंकि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्राह्मंड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनाएं घटित होतीं हैं जिससे कि वैज्ञानिकों को नये नये तथ्यों पर कार्य करने का अवसर मिलता है।उसी समय प्रकृति इस सूर्य ग्रहण के वंचित रहे भारत की राजधानी क्षेत्र दिल्ली को रिमझिम बारिश से नहाला रही थी। शीतकाल की इस पहली बारिश का लुफ्त दिल्ली वाले इस रविवार की सुबह रजाईं के अंदर सो कर उठा रहे थे।
सूर्य हमारी पृथ्वी सहित इस सौर परिवार के सभी ग्रहों का जीवनदायनी ऊर्जा का मूल स्रोत है। यह गुढ़ वैज्ञानिक सच्चाई है कि इस ब्रह्माण्ड में अनंत आकाश गंगायें हैं। इन आकाश गंगाओं में हमारे सूर्य जैसे करोड़ों अरबों सूर्य है। ऐसा माना जाता है कि हर सूर्य का अपना परिवार है।  हमारा सौर परिवार भी एक आकाश गंगा का एकांश ही है। अभी आधुनिक विज्ञान इस रहस्यमय सृष्टि के बारे में ज्ञान होना तो रहा दूर अभी हमारा विज्ञान अपनी पृथ्वी व सौर परिवार के बारे में पूर्ण रूप से विज्ञ नहीं है। केवल इस सृष्टि के बारे में कायश ही लगाया जा रहा है। निरंतर विज्ञान अनुसंधान कर रहा है।
इस गूढ़ रहस्य को जाने बिना मामले में आधुनिक शिक्षा के अल्प शिक्षित ग्रहण पर भारतीय विराट ज्ञान को अंध विश्वास बता कर नजरांदाज करने की नासमझी करता है। भारतीय मनीषियों को दिव्य खगोलीय ज्ञान कितना विराट था इसका भान इससे हो जाता कि जब दुनिया ईसा सन के प्रारम्भ से 4 हजार साल पहले ही भारतीय मनीषियों के पास सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से चार हजार पूर्व ही उपलब्ध थी। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक मनीषियों की अनमोल धरोहर हमारे पास है। परन्तु हम अंध विश्वास कह कर उसका मजाक उडाने की मूर्खता कर रहे है।
परन्तु खगोल वैज्ञानिक जानते है कि भारत का प्राचीन  खगोलीय ज्ञान बहुत विराट है। उसकी साया तक वर्तमान विज्ञान आत्मसात नहीं कर पायी।
हालंकी इस साल लगने वाले 5 सूर्य ग्रहणों आज 6 जनवरी को लगा यह सूर्य ग्रहण आंशिक सूर्यग्रहण रहा। यह आंशिक सूर्यग्रहण जापान, कोरिया, रूस,उतरी अमेरिका, चीन समेत अन्य कुछ देशों में यह नजर आया। पर भारत उप महाद्धीप में नहीं दिखाई दिया।
वैज्ञानिक धारणा के अनुसार पृथ्वी हमारे सौर मंडल का एक ग्रह है। अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी भी सूर्य के चारो और चक्कर लगाता है और चाँद, पृथ्वी का चक्कर लगाता है जब चाँद घूमते घूमते सूर्य और पृथ्वी के बिच में आजाता है तो वह सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देता इस लिए सूर्य का प्रकाश हम तक नहीं पहुँच पाता और सूर्य हमें दिखलायी नहीं देता इसे सूर्य ग्रहण कहते है इसे सूर्य ग्रहण कहते हैं।
सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के लगते है। ( 1 ) पूर्ण सूर्य ग्रहण -जब  चाँद, सूर्य किरणों को पूरी तरह रोक लेता है ( 2 ) कुंडलाकार सूर्य ग्रहण -जब सूर्य की रौशनी एक ऋण की तरह दिखाई देता है ।( 3 ) आंशिक सूर्य ग्रहण-जब सूर्य का एक भाग छिप जाता है तो उसे आंशिक सूर्य ग्रहण कहते है। 6 जनवरी को लगा सूर्य ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण ही था। यह भारत में नहीं दिखाई दिया।
ज्ञान के वर्तमान महासागर इंटरनेटी दुनिया में  गहन खोज के आधार पर ज्योतिष शास्त्र के अनुसार खगोलीय पिंडों का पूर्ण तथा अंशात्मक रुप से किसी अन्य पिण्ड से ढक जाना या उस पिण्ड के पृष्ठ भाग में आ जाना ग्रहण कहलाता हैं। आकाशीय पिण्ड किसी अन्य आकाशीय पिण्ड  से ढक जाने पर नजर नहीं आता तो ऐसी स्तिथि में आकाश मंडल में ग्रहण योग बनता है। जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृ्त यानी बाधक हो जाए। इस प्रकार के ग्रहण के लिए चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृ्थ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का आवृ्त भाग नहीं दिखाई देता है।

सूर्य ग्रहण का मानव सहित पृथ्वी के हर जीव व प्रकृति पर बहुत बड़ा प्रभाव है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य ग्रहण क्रूर व अशुभ माना गया है तथा अशुभ फल प्रदान करता है।  जिन क्षेत्रों में सूर्य ग्रहण का प्रभाव रहता है उन क्षेत्रों में मानव जीवन की हर प्रकार के कार्यों में व्यवधान उत्पन करता है ।
हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिए ऋषियों ने पात्रों के कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जाएं। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं।
ज्योतिषियों के अनुसार ग्रहण का विशेष प्रभाव गर्भवती के महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है । जिस कारण गर्भवती महिलाओं को विशेष नियमों का पालन करना है की गर्भ में पल रहा बच्चा सुरक्षित रहे। ग्रहण काल के समय गर्भवती महिलाएं भगवान सूर्य देव के मंत्रों का पाठ कर सकती है। नुकीली चीज का प्रयोग न करें, कपड़े न सिले अर्थात सुई का प्रयोग न करें,ग्रहण के दौरान चाकू का प्रयोग न करें,ग्रहण के बाद स्नान करें, ईश्वर को नमन् करे।
भारतीय धार्मिक विश्वास के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की संतान हैं। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं। चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें। ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कुछ भी कैंची या चाकू से काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलने से रोका जाता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं।

ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किए गए हैं। कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्घ्मण को दान देने का विधान है। कहीं-कहीं वस्त्र, बर्तन धोने का भी नियम है। पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा भरकर पिया जाता है। ग्रहण के बाद डोम को दान देने का अधिक माहात्म्य बताया गया है, क्योंकि डोम को राहु-केतु का स्वरूप माना गया है।

सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण में तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये। बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना और भोजन करना – ये सब कार्य वर्जित हैं। ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्देश्य करके जल में जल डाल देना चाहिए। ऐसा करने से देनेवाले को उसका फल प्राप्त होता है और लेने वाले को उसका दोष भी नहीं लगता। ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। श्देवी भागवतश् में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये।

भारतीय संस्कृति में वैदिक ज्योतिष में ग्रहण का बहुत ज्यादा महत्व है। इसका सीधा प्रभाव मानव जीवन सहित सभी जीव जन्तुओं पर पड़ता है। इसी कारण से गर्भवती महिलाओं, सहित अन्य आवश्यक कार्यो में पालन करना उत्तम होगा। मनीषियों ने मनुष्यों का मार्ग दर्शन किया कि वे ग्रहण न देखें

सूर्यग्रहण होने के लिए निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है। अमावस्या होनी चाहिये। चन्दमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिये। चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए।, उत्तरी धु्रव को दक्षिणी धु्रव  से मिलाने वाली रेखाओं को रेखांश कहा जाता है तथा भूमध्य रेखा के चारो वृ्ताकार में जाने वाली रेखाओं को अंक्षाश के नाम से जाना जाता है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हों। चन्द्र और राहू या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिए। सूर्यग्रहण होने के लिए निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है। अमावस्या होनी चाहिये। चन्दमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिये। चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए।,
प्रायः इस धरती पर सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि चन्द्र ग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं। 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात आता है।
ग्रहण का कोई आध्यात्मिक महत्त्व हो अथवा न हो किन्तु दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए यह अवसर किसी उत्सव से कम नहीं होता। क्यों कि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्राह्मंड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनाएं घटित होतीं हैं जिससे कि वैज्ञानिकों को नये नये तथ्यों पर कार्य करने का अवसर मिलता है। विराट सृष्टि में इन ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की ग्रहण की घटना का भारतीय मनीषियों का गहन अध्ययन है। उनके अनुभवों व ज्ञान का सदप्रयोग करना बुद्धिमता है। उसको अंध विश्वास कह कर उसका उपहास उडाना मूर्खता पूर्ण कदम ही होगा। वैज्ञानिक भी मानते है केवल पश्चिमी शिक्षा के अल्पज्ञानी लोग ही अंधविश्वास कहते है। हाॅ लोगों को मनीषियों द्वारा सुझायी गयी सावधानियों का आत्मसात करना चाहिए परन्तु कालनेमी बने ढौगियों द्वारा किये जा रहे लूट खसोट से बचना चाहिए।

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