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राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए उत्तराखण्ड के कवियों, साहित्यकारों व पत्रकारों ने संसद पर धरना देकर प्रधानमंत्री से लगायी गुहार

प्रधानमंत्री मोदी को दिया ज्ञापन

नई दिल्ली(प्याउ)। उत्तराखण्ड राज्य गठन के 17 साल बाद भी प्रदेश की सरकारों ने  जनता, आंदोलनकारियों व कौशिक कमेटी तय की गयी ‘राजधानी गैरसैंण को विधिवत प्रदेश की राजधानी घोषित करने में जब प्रदेश की तमाम  सरकारें असफल रही तो आहत कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों, राज्य गठन आंदोलनकारियों व समर्पित  उत्तराखण्डियों ने 10 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी से अविलम्ब प्रदेश की राजधानी गैरसैंण  को घोषित करने की मांग को लेकर संसद पर एक दिवसीय धरना दिया। इस अवसर पर कवियों ने जहां अपनी कविताओं के माध्यम से प्रदेश की जनमानस की वेदना को व्यक्त किया। वहीं इस अवसर पर  पत्रकारों, कलाकारों, राज्य गठन आंदोलनकारियों व समर्पित उत्तराखण्डियों ने राज्य गठन की जनांकांक्षाओं को साकार करने, प्रदेश के चहुंमुखी विकास करने, शहीदों की शहादत को साकार करने व देश की सुरक्षा के लिए प्रदेश की राजधानी गैरसैण घोषित करने की नितांत जरूरत बतायी। इस अवसर पर जनगीतों का भी गायन किया गया।
इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए आयोजक वरिष्ठ आंदोलनकारी देवसिंह रावत, अवतार नेगी व अनिल पंत ने बताया कि‘राजधानी गैरसैंण निर्माण अभियान दिल्ली’ के बेनरतले,  10 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से राजधानी गैरसैंण बनाने की गुहार लगाने के लिए संसद की चैखट, संसद मार्ग दिल्ली पर विशाल धरना दिया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया। ज्ञापन में प्रधानमंत्री का ध्यान इस बात के लिए आकृष्ठ किया गया कि गैरसैंण राजधानी न बनाये जाने से प्रदेश बदहाली के कगार पर है। इससे जनता में भारी आक्रोश है। पूरे प्रदेश में राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग को लेकर निरंतर आंदोलन छिडी हुआ है। सरकारें जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए गैरसैंण में विधानसभा सत्रों को आयोजन तो करती है परन्तु वहां पर राजधानी घोषित नहीं कर रही है।
दलगत राजनीति से उपर उठ कर समर्पित उत्तराखण्डियों ने  इस आयोजन में भाग लिया। इस अवसर पर आंदोलनकारियों ने   गैरसैंण को राज्य गठन की जनांकांक्षाओं, लोकशाही,  प्रदेश के चहंुमुखी विकास व देश की सुरक्षा का प्रतीक बताते हुए प्रधानमंत्री से राजधानी गैरसैंण बनाने की पुरजोर मांग करते हुए ज्ञापन भी दिया।  देश के इस चीन से लगे प्रदेश की सीमाओं से हो रहा पलायन देश की सुरक्षा के लिए बहुत ही घातक है। आंदोलनकारियों ने कहा की प्रदेश की जनता ने जो अभूतपूर्व जनादेश दिया वह प्रदेश की इस जनांकांक्षाओं को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर विश्वास करके ही दिया है। प्रदेश की जनता को आशा है कि प्रधानमंत्री जनता के विश्वास व शहीदों की शहादत का सम्मान करते हुए राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग करेंगे।
 गैरसैंण राजधानी क्यों बननी चाहिए इससे जुडे निम्न लिखत प्रमुख तथ्यों को ज्ञापन में रखकर प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ठ किया गया-

(1)-प्रदेश में एक मात्र विधानसभा  भवन गैरसैंण के भराड़ी सैण में बना हुआ है।
(2)- गैरसैंण विधानसभा भवन में विधानसभा का शीतकालीन सत्र 2017 में सम्पन्न हो चूका है। गैरसैंण में ही विधानसभा का ग्रीष्मकालीन सत्र भी सम्पन्न हो चूका है। (3)-उत्तराखण्ड प्रदेश का बजट सत्र 2018 भी गैरसैंण में किया जा रहा है। (4) राज्य गठन जनांदोलन से पहले ही  राज्य गठन आंदोलनकारियों ने  सर्व सम्मति से प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनाने को एकमत थी। (5)-उत्तराखण्ड राज्य व राजधानी गैरसैंण के लिए ही प्रदेश के सवा करोड़ जनता ने ऐतिहासिक जनांदोलन  किया और शहादत दी। (6)-राज्य गठन के बाद, राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग को लेकर बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने दी शहादत।
(7)-राज्य गठन से पहले ही पूर्व उप्र सरकार द्वारा गठित रमांशंकर कौशिक आयोग द्वारा उत्तराखण्ड की राजधानी के लिए आंदोलनारियों, जनता व विशेषज्ञों से गहन चिंतन मंथन व निरीक्षण कर  गैरसैंण को जनांकांक्षाओं को साकार करने वाली राजधानी घोषित की।
(8)  -राज्य गठन के बाद जनभावनाओं, दीक्षित आयोग व हिमालयी राज्यों की तरह गैरसैंण बनाने के बजाय देहरादून में राजधानी बनाने के षडयंत्र के तहत ‘राजधानी चयन के लिए दीक्षित आयोग’ बनाया। इस आयोग ने जानबुझ कर करोड़ों रूपये बर्बाद कर  दस साल तक इसे उलझाये रखा। परन्तु इस दीक्षित आयोग ने भी दो तिहाई से अधिक लोगों ने राजधानी के लिए गैरसैंण बनाने के लिए अपना मत दिया। (9)-आजादी के संग्राम में ‘पेशावर क्रांति ’ के महानायक चंद्रसिंह गढवाली ने गैरसैंण क्षेत्र में ही इस पर्वतीय क्षेत्र का आदर्श शहर बसाने का संकल्प लिया। (10)   गैरसैंण उत्तराखण्ड प्रदेश के मध्य में स्थित है। (11) हिमालयी राज्यों की तरह हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। (12) -प्रदेश गठन के बाद पंचतारा सुविधाओं भोगी नेताओं व नौकरशाहों ने गैरसैंण में राजधानी बनाकर शासन चलाने के बजाय जनांकाक्षाओं, शहीदों की शहादत,प्रदेश के चहुंमुखी विकास, देश की सुरक्षा को नजरांदाज करते हुए  प्रदेश गठन की मूल अवधारणा का गला घोटने का काम करते हुए बलात देहरादून में ही कुण्डली मारे हुए है। 

इससे प्रदेश गठन की मांग के लिए जिन पर्वतीय व सीमान्त जनपदों ने दशकों लम्बा संघर्ष कर शहादते दी, वहां से शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा व शासन से उपेक्षित होने के कारण विनाशकारी पलायन हो गया।क्योंकि देहरादून में काबिज हुक्मरान के साथ सीमान्त जनपदों के शिक्षक, चिकित्सक, कर्मचारी तमाम देहरादून, हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर में अपना तबादला करने में लगे है।  इससे चीन सीमा से लगे इस सीमान्त प्रदेश की यह स्थिति देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गयी है।
10 मार्च को गैरसैंण राजधानी निर्माण अभियान के बेनर तले बडी संख्या में उत्तराखण्डी संसद मार्ग  पर एकत्रित हो कर राज्य गठन आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए राजधानी गैरसैंण गैरसैंण के समर्थन में गगनभेदी नारे लगाते रहे। प्रधानमंत्री मोदी वादा निभाओं गैरसैंण राजधानी बनाओ!/शहीदों का यही अरमान, राजधानी गैरसैंण/ पलायन का एक ही समाधान राजधानी गैरसैंण!/ लोकशाही का सम्मान करो राजधानी गैरसैंण बनाओ के गगनभेदी नारे लगाये।
प्रधानमंत्री मोदी को दिये गये ज्ञापन में प्रधानमंत्री को स्मरण कराया गया कि 9 नवम्बर 2000 में राजग की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा गठित उत्तराखण्ड राज्य के गठन हुए 17 साल हो गये हैं परन्तु इन 17 सालों में प्रदेश की सरकारों ने राज्य गठन जनांदोलन की जनांकांक्षाओं को साकार करने के बजाय उसको निर्ममता से रौंदने का ही कृत्य किया। इसका सबसे जीवंत उदाहरण है राज्य गठन के समय सर्वसम्मति से जनता व आंदोलनकारियों द्वारा एक मत से प्रदेश की राजधानी गैरसैंण को बनाने में अब तक की सभी सरकारें असफल रही है।    सबसे शर्मनाक बात यह है कि लोकतंत्र में जनता की सर्वसम्मत मांग ‘ राजधानी गैरसैंण’ को बलात नजरांदाज करके बलात देहरादून में राजधानी थोपी गयी। प्रदेश की राजधानी गैरसैंण न बनाये जाने से और पंचतारा सुविधा भोगी नेताओं व नौकरशाहों ने षडयंत्र कर बलात देहरादून से शासन संचालित किये जाने के कारण, प्रदेश गठन की मांग करने वाले सभी पर्वतीय जनपदों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व शासन से वंचित सा हो गये है, जिस कारण यह देश का चीन सीमा से लगा उत्तराखण्ड  प्रदेश में पलायन की गंभीर समस्या से ग्रसित हो कर प्रदेश उजड़ने के कगार पर है। राज्य गठन जनांदोलन में जो शहादतें व संघर्ष किया गया वह गैरसैंण राजधानी के लिए भी था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी प्रदेश की सरकारों को इसलिए कटघरे में खडा किया है। उससेे राज्य गठन की मांग के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले अग्रणी आंदोलनकारियों व इस आंदोलन में समर्पित प्रदेष की लाखों लाख जनता प्रदेश के शासकों द्वारा जनभावना का सम्मान करते हुए राजधानी गैरसैंण बनाने के बजाय बलात देहरादून में  राजधानी थोपने से ठगा सा महसूस कर रही है।
संसद की चैखट पर आयोजित कार्यक्रम का संचालन देवसिंह रावत ने किया। कार्यक्रम के शुभारंभ में उत्तराखण्ड एकता मंच के संचालक मंडल के सदस्य दिगमोहन नेगी ने ये केसी राजधानी है का जनप्रिय लोकगीत गाया। इस जनगीत का सामुहिक गायन से संसद मार्ग गुंजायमान हो गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकार अवतार नेगी में समन्वय अनिल पंत व मोहन जोशी ने किया। इस आयोजन में भाग लेने वाले प्रसिद्ध कवियों में सर्वश्री डा पृथ्वी सिंह केदारखण्डी,  पूरण चंद्र कांडपाल,  वरिष्ठ पत्रकार कवि व्योमेश जुगरान, रमेश हितैषी, विजय मधुर,प्रदीप रावत खुदेड़, जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू , प्रेमा धोनी, गायिका मंगला रावत, हंसा अमोला, दिनेश ध्यानी, वीरेन्द्र जुयाल अजनबी, आदि सम्मलित हुए। अपने विचार प्रकट करने वालों में शिक्षाशात्री राम प्रसाद भदूला,   गढ़वाल हितैषिणी सभा के पूर्व अध्यक्ष गंभीर सिंह नेगी, देश के जनवादी आंदोलनों के नेता भूपेन्द्र सिंह रावत व वरिष्ठ आंदोलनकारी यशपाल रावत प्रमुख रहे। वहीं प्रसिद्ध लोक गायिका मंगला रावत ने गैरसैंण व राज्य गठन आंदोलन से जुडे गीतों को गा कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उपस्थित जनसमुदाय ने वरिष्ठ पत्रकार व्योमेश जुगरान सहित सभी कवियों की गैरसैण को समर्पित कविताओं को मुक्त कंठ से सराहना की।
इस कार्यक्रम में भाग लेने वालों में वरिष्ठ पत्रकार कुशाल जीना, पूर्व आंदोलनकारी कल्याण परिषद के अध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप, गढ़वाल हितैषिणी सभा के पूर्व अध्यक्ष गंभीर सिंह नेगी, रंगकर्मी आंदोलनकारी खुशहाल सिंह बिष्ट, पत्रकार अमर चंद व सतेन्द्र रावत,  भूगर्भशास्त्री बलबीर सिंह धर्मवान,वरिष्ठ आंदोलनकारी प्रताप रावत, भारतीय भाषा आंदोलन के महासचिव अभिराज शर्मा व महासचिव रामजी शुक्ला, वरिष्ठ समाजसेवी आलमदार अब्बास, पत्रकार दीप चंद्रा, मोहन सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार सुनील नेगी, अनाम धस्माना, गढ़वाल हितैषिणी सभा के महामंत्री दीप प्रकाश भट्ट व कोषाध्यक्ष जितेन्द्र सजवान, आंदोलनकारी शिवसिंह रावत, रमेश जी, सुषमा जुगरान ध्यानी, रालोद के दिल्ली प्रदेश महासचिव मनमोहन शाह, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा के अध्यक्ष विनोद नौटियाल, उत्तराखण्ड सम्मान से सम्मानित उद्यान पण्डित गोपाल उप्रेती, ले. कर्नल पटवाल चंदरी,मयूर रावत, पत्रकार दीप सिलोड़ी, आंदोलनकारी कमल किशोर नौटियाल
व किशोर रावत,विकास शर्मा, श्रीओम शर्मा, दानसिंह रावत, जसपाल सिंह असवाल, कमल सिंह कठैत, विनोद सिलस्वान, आंदोलनकारी उमेश रावत, देव फोनिया, जगमोहन सिंह रावत, द्वारिका प्रसाद भट्ट, पत्रकार हरीश लखेड़ा, वरिष्ठ भाजपा नेता जगदीश मंमगांई, पत्रकार दिनेश जोशी आदि प्रमुख थे।

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