अध्यात्म

संघे शक्ति युगे युगे: —————-(सृष्टि में सफलता का मूल मंत्र )

देव सिंह रावत
संघे शक्ति युगे युगे, भगवान श्रीकृष्ण  का यह अमर घोष प्राणीमात्र के लिए इस सृष्टि में अनादि काल से मार्गदर्शक रहा है। यह बात कलयुग में ही नहीं सभी युगों में चरितार्थ होता है। सतयुग हो या द्वापर या त्रेता युग। हर समाज व हर देश में यह सफलता का मूल मंत्र प्राणी मात्र को सफलता की मंजिल पर आसीन कराता है।

हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि ‘संघे शक्ति युगे युगे’ तभी सफल होता है जब नेतृत्व जनहित, न्याय व सर्वभूत हित के लिए समर्पित दिशावान हो तथा संगठन अनुशासित हो। अन्यथा दुर्योधन जैसे पदलोलुपु, अन्यायी,अवसरवादी व दिशाहीन नेतृत्व के कारण भीष्म,द्रोण, कर्ण जैसे महान अजेय योद्धाओं की विशाल सेना भी शस्त्र विहिन श्रीकृष्ण व पांच पांडवों की छोटी सी सेना के सामने कुरूक्षेत्र में परास्त हो गयी थी।
परन्तु यह बात भी हमें हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि संघे शक्ति वाला यह सफलता का मूल मंत्र तभी सफल होता जब नेतृत्व व संगठन जनहित व न्याय के पथ पर चलता है। अन्याय के पथ पर चलने वाला संगठन कितना भी बड़ा व संगठित क्यों न हो वह सफल नहीं हो सकता। वह विशाल व संगठित लोग  गिरोह होता है वह असफल ही होगा।
संघे शक्ति  अंततः तभी सफल होता है जो सत्, न्याय व सबके कल्याण के लिए समर्पित होता है।  यही आदर्श माना जाता है।

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