उत्तराखंड

राजधानी गैरसैंण बनाने के लिए 30 जुलाई को संसद की चैखट पर हुंकार भरेगे उत्तराखण्डी

-अपने देश व प्रदेश को कुशासन व अन्याय से बर्बाद होते देख कर भी मूक रहना गुनाह है
-उत्तराखण्ड की लोकशाही, राज्य गठन की जनांकांक्षायें व समग्र विकास का प्रतीक है राजधानी गैरसैंण
-उप्र के साथ उत्तराखण्ड के परिसंपत्तियों का त्वरित बंटवारे के लिए
-मुजफ्फरनगर काण्ड सहित राज्य गठन जनांदोलन को कुचलने के गुनाहगारों को सजा देने
-हिमाचल सहित हिमालयी राज्यों की तरह उत्तराखण्ड में भू कानून बनाने के लिए

प्यारा उत्तराखण्ड की विशेष  रिपोर्ट-
जिस प्रकार से राज्य गठन के 17 सालों की सरकारों ने प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौंदने के कृत्य किये उससेे राज्य गठन की मांग के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले अग्रणी आंदोलनकारियों व इस आंदोलन में समर्पित प्रदेश की लाखों लाख जनता ठगा सा महसूस कर रही है।इसी को भांपते हुए राज्य गठन से लेकर अब तक इस पर निंरंतर आंदोलन करने वाले आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन तेज करने का मन बना लिया।30 जुलाई को संसद के समक्ष दिल्ली के जंतर मंतर पर गैरसैंण सहित अन्य मांगों को लेकर उत्तराखण्डी हुंकार भरेंगे। इन मांगों में राजधानी गैरसैंण, उप्र के साथ परिसम्पतियों का बंटवारे, मुजफ्फरनगर काण्ड सहित राज्य गठन आंदोलन को रौंदने वाले गुनाहगारों को सजा दिलाने, हिमाचल सहित हिमालयी राज्यों की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भू कानून बनाने आदि मांगों को लेकर किया जायेगा।
इसके तहत सभी आंदोलनकारी ताकतों, उक्रांद, भाजपा, कांग्रेस,वामपंथी आदि जो दलगत लक्ष्मण रेखाओं को दर किनारा करके गैरसैंण राजधानी बनाने के लिए एकजूट हो कर आंदोलन में भाग ले सकते है, उनका साथ भी राज्य का नाम बदलने की तर्ज पर चले आंदोलन की तरह ही लिया जायेगा। इस आंदोलन में महिला, छात्र व पूर्व सैनिक संगठनों के अलावा काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, हरीश रावत, सभी सांसदों, भाजपा के मोहन सिंह ग्रामवासी,सहित सभी आंदोलनकारी ताकतों व गैरसेंण समर्थक राजनैतिक दलों को लामबद हो कर गैरसेंण के लिए एक संयुक्त दवाब बनाना होगा। इस आंदोलन को संसद की चैखट से उत्तराखण्ड की सडकों पर उतारने के लिए आंदोलनकारी मन बना चूके है।

अपने देश व प्रदेश को कुशासन व अन्याय से बर्बाद होते देख कर भी मूक रहना गुनाह है

आज में जैसी ही संसद की चैखट, जंतर मंतर दिल्ली पर देष को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति के लिए 51 महीने से चलाये जा रहे भारतीय भाषा आंदोलन की एक तस्वीर फेसबुक पर जनजागरण के लिए लगायी तो। उस तस्वीर पर देहरादून से उत्तराखण्ड कांग्रेस के तेजतरार युवा तुर्क के नाम से विख्यात नेता, राजेन्द्र शाह ने त्वरित टिप्पणी की ‘ संघर्ष ही जीवन है ।
बधाई,शुभकामनाएं देव सिंह भाई ।। संघर्ष के साथियों को सलाम!
रात को घर आने के बाद 9.30 बजे के करीब फेसबुक देखा तो राजेन्द्र भाई की टिप्पणी पढ़ कर उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के संघर्ष के उन दिनों की याद बरबस ही आ गयी जो जो हम साथियों ने मिल कर गुजारे थे। इन गीतों को स्वर देते वो पल भी याद हैं………..

जेता एक दिन तो आलो दिन य दुनी माॅ…………..( गिर्दा).
…….., हिमालय पुकारता एक हो कर हम चले …………
उठ जाग उत्तराखण्डी ………………….(नरेन्द्र नेगी)
जाग जाग है उत्तराखण्ड हे नरसिंह भैरों बजरंग………..(नरेन्द्र नेगी)
ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के …………………………..(सरदार बली चीमा)

राज्य आंदोलन के अनैक साथी राज्य गठन के 17 साल बाद भी आज राजनीति में हैं। मेरे सबसे करीबी साथी रहे राज्य गठन आंदोलन के साथ राजेन्द्र शाह जहां कांग्रेस की राजनीति कर रहे हैं, राजपाल, हरपाल रावत व लक्ष्मण रावत भी कांग्रेसी नेता है।  डा हरक सिंह रावत मंत्री है भाजपा में, केदार रावत यमुनोत्री से विधायक हैं। प्रकाश सुमन ध्यानी भाजपा के नेता है। प्रदीप टम्टा भी कांग्रेस से राज्य सभा सांसद है। प्रताप शाही ही नहीं उक्रांद अध्यक्ष दिवाकर भट्ट, काशी सिंह ऐरी सहित कई नेता है। वहीं किशोर उपाध्याय,थीरेंद्र प्रताप, राजेन्द्र भण्डारी, बृजमोहन उप्रेती व खुशहाल सिंह बिष्ट  भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। भाकपा(माले) के गिरजा पाठक व चंदन नेगी है।प्रभात ध्यानी, पीसी तिवारी, सुरेश नौटियाल व प्रेम सुन्दरियाल उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी में है।  डा शमशेर सिंह बिष्ट जन संघर्ष वाहिनी के ध्वजवाहक हैमहिला मंच की कमला पंत, महिला संयुक्त संघर्ष समिति की ऊषा नेगी, आशा बहुगुणा, कमला कण्डारी, लक्ष्मी गुसांई आज भी जनहित के लिए संघर्षरत नजर आती वहीं पूर्व सैनिक संगठन से उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा सहित अनैक नामों से अभी तक पी सी थपलियाल व रक्षा मोर्चा के रघुवीर बिष्ट को आज भी सड़क से लेकर फेसबुक पर उत्तराखण्ड के हितों के लिए संघर्ष करते देख कर सुखद अहसास होता। बचन सिंह धनोला व दीवान सिंह नयाल आप में है। एस के शर्मा व गोपाल उप्रेती भाजपा से जुडे है। मनमोहन शाह रालोद में जुडे हैं। कई साथी जो सक्रिय राजनीति में न रह कर भी उत्तराखण्ड के हितों पर सक्रिय रहते हैं उनमें राज्य गठन आंदोलन के डा एस पी सत्ती, सर्वोच्च न्यायालय व नैनीताल उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार रावत, पत्रकार अनिल पंत आदि साथी अपने स्तर से सक्रिय हैं।
मै किसी राजनैतिक दल का सदस्य नहीं हॅू पर मेरा  मुजफ्फरनगर काण्ड कराने वाली सपा को छोड़ कर किसी राजनैतिक दल से न दुराह नहीं है। क्योंकि राजनैतिक दल, जनता का सेवक होते है।  इनसे जनता व प्रदेश की  सही सेवा कराना हर जागरूक नागरिक की तरह मैं भी अपना दायित्व मानता हॅू। मेरा मानना है कि मेरा प्रदेश गैरसैण्ंा राजधानी न बनाने, भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगाने, मुजफ्फरनगर काण्ड के गुनाहगारों को सजा न देने, हिमाचल की तरह भू कानून न बनाने, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन का विरोध न करने, चहुमुखी विकास न करने व राज्य गठन की जनांकांक्षाओं को साकार न करने से राज्य गठन के लिए समर्पित आंदोलनकारियों के साथ प्रदेश के हितों के लिए समर्पित जनता भी बेहद निराश है। यही नहीं प्रदेश गठन के समय ही हम राज्य पुनर्गठन विधेयक में थोपी गयी उत्तराखण्ड के हितों को रोंदने वाली शर्तो का उसी समय हम विरोध कर रहे थे। जिस शर्मनाक ढंग में उत्तराखण्ड के कुछ आस्तीन के सांपों ने अपने संकीर्ण मानसिकता के लिए उत्तराखण्ड के भूगोल से खिलवाड किया, प्रदेश के जल, भूमि, नहर आदि संसाधनों पर षडयंत्र के तहत बंदरबांट की गयी। राज्य गठन के समय केन्द्र सरकार के साथ हमारे जनप्रतिनिधियों का दायित्व था कि वह राज्य के हक हकूकों की रक्षा करने का। जबकि आंदोलनकारी संगठन इस     विधेयक में बंटवारे की शर्तो का विरोध किया था। परन्तु इसकी अनसुनी केन्द्र सरकार ने की। राज्य गठन की आंधी में यह बातें जमीदोज हो गयी। परन्तु अब प्रदेश गठन के 17 साल बाद भी जब प्रदेश की कोई भी सरकार राज्य के कुछ हक हकूकों को उप्र से अर्जित नहीं कर पाया तो जनता को भी लगा दाल में कुछ काला है। यह काम राज्य गठन के पहले पांच सालों में हो जाना चाहिए था। परन्तु न तो प्रदेश के हुक्मरानों को प्रदेश के हितों की सुध रही व नहीं उन्हें उनकी ऐसी कोई प्राथमिकता ही रही। वे केवल सत्तामद में इतने चूर रहे कि बंटवारे का समाधान करना तो रहा दूर वे गैरसैंण, मुजफ्फरनगर काण्ड, भू कानून, भ्रष्टाचार, सुशासन की तरफ झांकने के लिए भी तैयार नहीं रहे। केवल पिछली बार कांग्रेस की बहुगुणा व हरीश रावत की सरकार ने गैरसैंण की सुध ली। परन्तु विधानसभा भवन आदि निर्माण करने का ऐतिहासिक काम करने के बाद भी हरीश रावत भी चुनावी समर से पहले राजधानी गैरसैंण की घोशणा न करने की ऐतिहासिक भूल कर बेठे। अब वर्तमान  त्रिवेन्द्र सरकार में इतनी नैतिकता भी नहीं नजर आ रही है कि करोड़ों रूपये से बने गैरसैंण विधानसभा का उपयोग कर गैरसैंण राजधानी बनाने के दायित्व का निर्वहन कर सके। लगता है भाजपा की इस सरकार को न प्रदेश के हितों का भान है व नहीं प्रदेश की जनांकांक्षाओं का। वे केवल मोदी मोदी करके प्रदेश को बर्बादी के गर्त में धकेलने को तुले है।
 मन में केवल एक ही सवाल आता है क्या राज्य प्रदेश के इन नेताओं, नौकरशाहों व उनके प्यादों की लूट खसोट के लिए बनाया। पूरा प्रदेश जानता है प्रदेश के अधिकांष जनप्रतिनिधी सब राज्य गठन से पहले या राजनीति में आने से पहले सामान्य जन की तरह थे। फिर दस पन्द्रह सालों में बिना किसी उद्यम के इन्होने कहां से इतनी अकूत सम्पतियां इकट्ठा कर ली। इन नेताओं ने ही नहीं इनके प्यादों ने भी प्रदेश में देहरादून सहित प्रदेश, देश में अपने लाखों -करोड़ों रूपये के आशियाने बना दिये है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अन्याय के खिलाफ सतत् कुरूक्षेत्र में रत रहने की सीख जो दी। इसीलिए मैं इस त्रासदी को मूक रह कर सहन नहीं कर सकता। कुछ साथी कहते हैं यह सरकार का काम है जो सरकार में आसीन हैं या राजनीति में हैं यह उनका काम है। यह सही की काम तो उन्होने ही करना है। हमें क्या मिलेगा? आखिर कब तक संघर्ष करें? क्यों करें? ये लोग तो अपनी राजनीति चमकायेंगे हम इनके साथ क्यों खडे हों? मेरा स्पष्ट मानना हैं यह प्रदेश व देश हमारा है, इसको बनाने, संवारने, बेहतर बनाने के साथ रक्षा करने का दायित्व जितना सरकार या नेताओं का है उतना ही जनता का भी है। देश व प्रदेश सही दिशा में संचालित होगा तो व्यवस्था सही होगी तभी आम जनता कल्याणकारी जीवन जी सकती है। नहीं तो सीरिया, मिश्र, लीबिया, इराक , अफगानिस्तान व पाकिस्तान की तरह मारकाट व तबाही के नरक में सभी को जीने के लिए अभिशापित होना पडेगा। तिब्बतियों व कश्मीरियों की तरह अपनी मातृभूमि से भागना पडेगा। अपनी बर्बादी का तमाशा देखने वाले कभी समझदार नहीं कहलाये जा सकते। परन्तु यह काम हम सबका है। हमे उन पर सही दिशा में काम करने का दवाब बनाये रखना चाहिए। इसी दवाब के कारण ही अंग्रेज देश से गये व राज्य बना।  भले ही कुछ  मैं वासुदेव सर्वम यानी यह मेरे कृष्ण का संसार मानने वाला, अपने देश प्रदेश की बर्बादी पर चुपचाप मौन क्यों रहूॅ। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

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